सांसारिक बंधन पुराने जूते जैसा होता है – पता ही नहीं लगता कि पैर जूते में फंसा है ।
पता तब लगता है जब जूता काटता है ।
निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी
असंविधानिक कार्य तो अवांछनीय है, पर अनैतिक कार्य तो अक्षम्य है ।
परमार्थ से अर्थ का महत्त्व जब बढ़ जाता है,
तब,
हम स्वार्थी बन कर अनर्थ की ओर बढ़ जाते हैं ।
प्रसन्न वही जो प्रशंसा में प्रसन्न न हो,
(तभी तो आलोचना में भी प्रसन्न रह पायेगा ) ।
शरीर में सामर्थ्य ना हो तो साधना कैसे करें ?
साधना शरीर से कम,मुख्य रूप से मन साधने से होती है ।
बटुए को कहाँ मालूम था कि पैसे उधार के हैं,
वो तो पहले की तरह फूला ही रहा ।
(मंजू)
एक बार संख्या 9 ने 8 को थप्पड़ मारा ,
8 रोने लगा…
पूछा मुझे क्यों मारा..?
9 बोला…
मैं बड़ा हूँ, इसीलिये मारा ।
सुनते ही 8 ने 7 को मारा
और 9 वाली बात दोहरा दी ।
7 ने 6 को..
6 ने 5 को…..
अंत में 2 ने 1 को ।
अब 1 किसको मारे ?
1 के नीचे तो 0 था !
1 ने उसे मारा नहीं,
बल्कि प्यार से उठाया
और उसे अपनी बगल में बैठा लिया ।
जैसे ही बैठाया…
उसकी ताक़त 10 हो गयी !
और 9 की हालत खराब हो गई ।
ज़िंदगी में किसी का साथ ही काफ़ी है,
कंधे पर किसी का हाथ ही काफ़ी है ।
(सुरेश)
गन्ने में जहाँ गाँठ होती है वहाँ रस नहीं होता,
जहाँ रस होता है वहाँ गाँठ नहीं होती ।
बस, जीवन भी ऐसा ही है यदि मन में किसी के लिये नफ़रत की गाँठ होगी तो हमारा जीवन भी बिना रस का बन जायेगा…..
(आर.के.गुप्ता)
Patience is the art of hoping.
* धन तभी सार्थक है,
जब धर्म भी साथ हो।
* विशिष्टता तभी सार्थक है,
जब शिष्टता भी साथ हो।
* सुंदरता तभी सार्थक है,
जब चरित्र भी शुद्ध हो।
* सम्पति तभी सार्थक है,
जब स्वास्थ्य भी अच्छा हो।
* देवस्थान गमन तभी सार्थक है,
जब हृदय में भाव हो।
* विद्वता तभी सार्थक है,
जब सरलता भी साथ हो।
* प्रसिद्धि तभी सार्थक है,
जब मन में निरअहंकारिता हो।
* बुद्धिमता तभी सार्थक है,
जब विवेक भी साथ हो।
* परिवार का होना तभी सार्थक है,
जब उसमें प्यार और विश्वास हो।
(नमिता-सूरत)
Do I not destroy my enemies when I make them my friends ?
Abraham Lincon
जो इंसान “खुद” के लिये जीता है ,उस का एक दिन “मरण” होता है ,
परंतु जो इंसान “दूसरों” के लिये जीता है ,उस का हमेशा “स्मरण” होता है ।
(आर.के.गुप्ता)
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