जितना आडंबर ज्यादा, उतनी उलझनें बढ़ती हैं।
एक बार बाहर दिखाने का क्रम बन गया फिर वह दिखावा आपकी मजबूरी बन जाता है। दिखावे वाले पर दुनिया विश्वास नहीं करती और दुनिया चलती विश्वास से ही है।
व्यक्ति की असली पहचान तब होती है जब उसको विश्वास हो जाता है कि उसे कोई देख नहीं रहा।
सरल दिखाना आसान है बनना कठिन, सरल बननेे के लिए बहुत कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं, तब आप दीवार से देवालय बन सकते हैं यदि अंदर का देव जागृत हो जाए तो।
शिष्य बननेे के लिए आडंबरों/ बहुरूपीपने को छोड़ना पड़ेगा।
हमारे रोल तो बहुत हैं पर आडंबर छोड़ने पर हम एक रोल मॉडल बन जाते हैं।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 30 अगस्त)
मान रूपी बीज को जब माटी में मिलायेंगे तब सम्मान रूपी वृक्ष तैयार होगा।
मेरा अपमान न हो जाए इसकी तो बहुत चिंता, पर मैं अपमान योग्य ना हो जाऊँ इसका ध्यान नहीं।
आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… कोई देखे तो लज्जा आती, मर्यादा टूटने से ना।
निरीक्षण करते रहें… हमारा मान दूसरों के अपमान की ओर जा रहा है या दूसरे को मान देने की ओर !
हमारे पूर्णांक मजबूरी में कम हो सकते हैं पर पुण्य की कमी मंजूरी से ही।
बुद्धि में मान रखने वाला बुद्धू कहलाता है।
यदि कोई आपकी बार-बार आलोचना कर रहा हो तो दो पट्टियाँ बनाओ। हर बुराई सुनने पर पहली पट्टी में गांठ लगाते जाओ। जब पहली पट्टी गांठों से भर जाए तो देखें…पहली की लंबाई कम हो गई। क्या आप चाहते हैं, आपकी लंबाई कम हो ! पर दोनों का वजन बराबर होगा क्योंकि गांठों में आपने अपनी कोई धरणा नहीं रखी।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 29 अगस्त)
जो नज़रें झुकाए चलते हैं, दुनिया उनको नज़रें उठाए देखती है जैसे आचार्य श्री विद्यासागर जी जब हावड़ा ब्रिज से निकल रहे थे उनकी नज़रें झुकी हुई थीं, दुनिया की नज़रें उन पर झुकी हुई थीं।
क्षमा की चोट क्रोध पर भारी पड़ती है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 28 अगस्त)
क्रोध “पर” को जीतने के लिए किया था लेकिन “पर” ने हरा दिया।
क्षमा मांगने से निर्भय होते हैं,
करने से निर्भार।
अनुसंधान जब अतिसंधान बन जाता है तब सत्य, सत्याग्रह आंदोलन के रूप में परिवर्तित हो जाता है। तब सत्य पर ग्रहण लग जाता है, सत्य का ग्रहण नहीं होता।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 29 मई)
आचार्य श्री विद्यासागर जी से पूछा – इतनी सर्दी में आप बिना कपड़ों के कैसे सह लेते हैं ?
आचार्य श्री – गर्मियों में गर्मी जमा कर लेते हैं।
(गर्मी सहने से शरीर सर्दियों में भी सह लेता है।)
(अर्चना जैन – ग्वालियर)
“Knowledge decides what to say.
Behaviour decides how to say.
Talent decides how much to say.
Wisdom decides whether to say or not.”
(J.L.Jain)
सत्य की ही परीक्षा क्यों होती है ?
सत्य बोलना या सत्य बोलने का संकल्प लेने का मतलब… आपने हायर क्लास में जाने का फॉर्म भरा है, जब फॉर्म भरा है तो परीक्षा तो होगी न !
झूठ बोलते वाले ने तो फॉर्म ही नहीं भरा, उसकी परीक्षा कैसे होगी !
मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 26 मई)
मैंने तो मज़ाक में रोकी थी अपनी साँस,
रिश्ते खुले तो शर्म से मरना पड़ा मुझे।
(अरविन्द)
आचार्य श्री विद्यासागर जी के पास एक व्यक्ति को लाया गया जो सुसाइड करना चाहता था। आचार्य श्री स्वाध्याय कर रहे थे। वह व्यक्ति बैठा रहा 30 मिनट बाद आचार्य श्री ने नज़र उठाकर देखा। जब उसने अपनी व्यथा बताई, प्रश्न किया… इन 30 मिनट में तुमको कैसा लगा ? तुम्हारी अशांति शांत हुई ? उसने बोला हाँ ।
तो निष्कर्ष…मन अशांत हो तो वचन और काय को शांत रखो जैसे दलदल में फंसा आदमी जितनी काय को चलाएगा उतना डूबता जाएगा। पर हम ए.सी. शांत होने पर अशांत हो जाते हैं, पावर हाउस को जितना कोसने में पावर लगाते हैं, यदि उसे बचा लेते तो हम पावरफुल हो जाते।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 26 मई)
दुर्योधन के पास बड़ी सेना, दोनों गुरु, बड़े-बड़े गुरुजन, फिर भी हारा।
कारण ?
गुरुजनों से चाहता था।
पांडव गुरुजनों को चाहते थे।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
अपने आप को सामने वाले की स्थिति में रखकर सोचना, Empathy कहलाता है।
(एकता – पुणे)
भगवान बनने के लिए (श्री रयणसार के अनुसार) – पहले भक्त बनो।
किसके ?
देव-शास्त्र-गुरु के,
देव/ गुरु प्रपंच रहित, शास्त्र विवाद/ विरोध रहित हैं।
भक्त कौन ?
जो देव-शास्त्र-गुरु के बताए रास्ते पर चले।
आर्यिका श्री अर्हम्श्री माताजी
ईर्ष्या की ख़ासियत – जिनसे करोगे उसकी प्रगति होगी (सामने वाला Competition में और मेहनत करता है)।
प्रेम किया तो वह अकर्मण्य हो जायेगा (जैसे प्रेम में आप उसके काम करने लगोगे)।
मुनि श्री विनम्रसागर जी
आचार्य श्री विद्यासागर जी अपने शिष्यों और भक्तों को सिंह बनाते थे, इसलिए हंटर जैसा अनुशासन रखते थे, श्वान नहीं जिसको पट्टा डालकर घुमाया जाए।
भिखारी*, व्यापारी** नहीं, पुजारी*** बनाते थे।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (जीवकांड-गा.229 – 22 मई)
* हमेशा मांगने वाला।
** देने के बदले लेने की इच्छा रखने वाला।
***जो सिर्फ़ देना/ भक्ति करना जानता हो।
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