आचार्य श्री विद्यासागर जी कहा करते थे… झूठ यदि सफ़ेद हो सकता है तो सत्य को कड़वा कहने में क्या दुविधा !
पर सत्य होता है बर्फ़ जैसा, अग्नि पर रखने पर भी वह गर्म नहीं होता, वह अपना सत्यपना नहीं छोड़ता।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 12 मई)
एक आदमी था।
राजा बनते ही आदमी मर गया, राजा जीता रहा।
ब्र. डॉ. नीलेश भैया
स्वाभिमान के साथ जब अकड़ आ जाती है तब वह अभिमान का रूप ले लेता है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जिज्ञासा समाधान – 4.4.22)
वैराग्य कारण –> मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है ?
विषाद कारण –> मेरे साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है ?
चिंतन
धर्म प्रवाह
प्रभावित हुई क्या
बिना विवाह।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
कर्म करना ज्यादा महत्वपूर्ण या धर्म करना ?
क्या धर्म कर्म नहीं ?
क्या कर्म धर्ममय नहीं हो सकता ?
कितना, कब, क्यों और कौन सा कर्म करना, यही तो धर्म है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 15 मई)
आचार्य श्री विद्यासागर जी से प्रश्न किया कितने लोग मुनिराजों के चतुर्मास के लिए प्रयास करते हैं, पहले से घोषणा कर दी जाए तो उनके लिए सुविधाजनक होगा ?
आचार्य श्री …इतने लोग, इतने दिनों तक जो पुण्य लाभ करते हैं, उसमें व्यवधान क्यों डालना चाहते हैं ?
इसी तरह, जिन स्थानों पर मुनिराज होते हैं वहाँ बहुत सारे लोग शुद्ध भोजन बना कर चौके लगाना चाहते हैं, उसमें आप अंतराय क्यों डालना चाहते हैं ?
निर्यापक मुनि श्री सुधा सागर जी (प्रवचन – 5 मार्च ’24)

(अरुणा)
किसी की नकल करना आत्महत्या है।अपनी आत्मा की हत्या ही तो है!
हर व्यक्ति के अपने-अपने मौलिक गुण होते हैं,उनकी हत्या ही तो होगी!
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जिज्ञासा समाधान – 19/322)
पैसा जड़ (निर्जीव) है, पर हमारी जड़ें हिला देता है (मनुष्यता को हिला देता है)।
चिंतन
शांतिधारा(भगवान के ऊपर जल ढालना) करते समय जल की धारा टूटने पर प्रायश्चित बहुतों ने लिया क्योंकि उसका उपयोग टूट गया था। पर गुरु के प्रवचन की धारा तोड़ने वाला आज तक कोई नहीं आया !
गर्भ में अभिमन्यु का उपयोग जब तक लगा रहा, वह चक्रव्यूह तोड़ने की कला में माहिर हो गया। उपयोग टूटने पर चक्रव्यूह से निकलने की कला ना सीख सका और धर्म की नीति का शिकार हुआ जबकि कौरवों ने धर्मनीति का शिकार किया।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 3 जुलाई)
मान भी बुरा नहीं, बस विवेक रखना है कि कहाँ पर/ अभिप्राय क्या है !
मान को प्रामाणिक बना लें।
आत्मकेंद्रित(Self oriented) बुरा नहीं, स्वार्थी(Selfish) होना बुरा है।
स्वाभिमान Broad mindedness है जबकि अभिमान Narrow mindedness, स्वयं के Ego की रक्षा करने में लगा रहता है।
ध्यान रहे कि मान की रक्षा हमें किस ओर ले जा रहा है।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 14 मई)
शील यानी स्वभाव।
जैसे ज्वलनशील (जलने वाला), सहनशील।
कमलकांत
दुर्जन कौन ?
जो दूषित भोजन करता हो। आचार्य श्री विद्यासागर जी कहा करते थे… दुर्जन को पहचानना कठिन, बचना भी कठिन। व्यक्ति दुर्जन से बचने का तो प्रयास करता है पर दूषित भोजन से नहीं। दूषित भोजन से बचना आसान है पर बचता कोई नहीं, जबकि दुर्जन के साथ यह उल्टा होता है। प्राय: लोग कहते हैं…हम दुर्जन नहीं, पर सच्चाई यह है कि दुर्जन के साथ रह-रह कर हम भूल जाते हैं कि हम भी दुर्जन हो चुके हैं।
मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 11 मई)
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