हमारा संसार प्रतिध्वनियों का ही है, जिसे हम प्रतिपल जी रहे हैं।
पाप कर्मों की भी प्रतिध्वनियां सताती हैं, क्रिया एक प्रतिक्रिया अनेक। यह सिद्धांत सत्कर्मों में भी लगता है तभी तो कहा.. कर्म फला अरिहंता(शुभ कर्म भगवान तक बना देते हैं)।
हम अपनी ही पाप क्रियाओं की प्रतिध्वनियां भी स्वीकार नहीं करते हैं जैसे चोर चोरी करके जब घिर जाता है तो चोरी का सामान पटक कर कहता है… यह मेरा नहीं है।
प्रतिध्वनि कम करने के लिए विशेषज्ञ उल्टे मटके लटका देते हैं यानी खाली होना सीख जाओ। पहले अनावश्यक को कम करो, साधुजन तो आवश्यक को भी कम करके गुरु बनते हैं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 22 मई)

1947 से पहले का भारत Physically गुलाम था, पर आज का भारत दिमागी तौर पर Ethically गुलाम है।
गुणों का नीलाम होना ही गुलाम बनाता है।
आज तो हिंदी को भी रोमन लिपि में लिखा जाता है। यह जानते हुए भी कि देखने का प्रभाव 83% होता है, इसीलिए आदिनाथ भगवान ने भाषा नहीं लिपि सिखाई थी। पराधीनता का निमंत्रण-पत्र प्रमाद की मिठाई के साथ ही दिया जाता है।
फिरंगियों ने असन(भोजन), वसन(वस्त्र) और आसन का प्रलोभन देकर हमें पराधीन किया। जिसमें हम आज तक फंसे हुए हैं।
ग्वालियर के श्री अमरचंद बांठिया कोषाध्यक्ष(सिंधिया राजा) ने सेनानियों की सहायता के लिए कोष खोल दिया था और इसीलिये अंग्रेजों ने उन्हें तीन दिन तक फांसी पर लटकाए रखा था।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 1 से 15 अगस्त)

धूप में छाँव का अनुभव करते हो या छाँव में धूप का डर रहता है ! डरेगा वह नहीं जिसके जीवन में भगवान/ गुरु की छत्रछाया होगी।
जो चंवर ढुलवाने की अपेक्षा नहीं रखते, उनके ही 64 चंवर ढुलते हैं।
जो है उसको छोड़ने की तैयारी है या जो नहीं है उसको और पाने की !

कर्तापने से बचकर ही मोक्ष हो सकता है।
एक राज्य में अकाल पड़ गया और पड़ोसी राजा आक्रमण करने आ पहुँचा। राजा अपने गुरु के पास गया, अपना दु:ख बताया। पर एक और परेशानी थी…उसका सेवक आराम से सोता था !
उत्तर… तू भी सेवक बन जा। सेवक मान कर राज्य चला, कर्ता बनकर नहीं।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 21 मई)

विरोधी को सहन नहीं करोगे तब तक प्रगति नहीं/अंतिम मंजिल मोक्ष नहीं।
सारे महान लोगों तथा भगवानों तक ने विरोध को विनोद रूप में लिया तभी वे महान बने/भगवान बने।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 21 मई)

प्रगति में महत्त्वपूर्ण अवरोध,  पूर्व के मूढ़ता वाले विचार होते हैं। उनसे हम डिगना/छोड़ना नहीं चाहते हैं। जब तक उनकी तेरहवीं नहीं करेंगे तब तक नया जन्म नहीं हो सकता है।

(पीयूष जैन – दिल्ली)

कषाय* की कसाहट अंदर ज्यादा होती है, बाहर कम दिखती।
कषाय की सफाई कठिन है, उसके लिए साफ सुथरा स्थान रखना होगा जहाँ उसकी सम्मूर्छनों* की तरह उत्पत्ति ही ना हो।
विडंबना, हम कन्फेस भी करते साथ साथ जस्टिफाई भी करते रहते हैं।
कारगर उपाय… निरीक्षण नहीं, तो नियंत्रण नहीं।
* क्रोध मान माया लोभ।
** कीड़े मकोड़े।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 21 मई)

आज के दिन को “रक्षा-दिवस” के रूप में मानना चाहिए क्योंकि आज 700 मुनिराजों के ऊपर घोर उपसर्ग को दूर करने के लिए मुनि विष्णु कुमार अपनी तपस्या को त्याग करके वात्सल्य भाव से मुनिराजों का उपसर्ग दूर करने आए थे।
हम वात्सल्य-दिवस को कैसे मनायें ?
ऑनलाइन शॉपिंग को कम करके, साधर्मीं भाइयों से सामान लेकर उनके प्रति अपना वात्सल्य दर्शायें।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 8 अगस्त)

आजकल सबसे महत्वपूर्ण और सबसे आम… वायु की समस्या है।
इसके कारण…
असमय भोजन करना।
व्यर्थ की और अधिक बातें करना।
सोने और उठने का समय निश्चित ना होना।
एसी और कूलर का प्रयोग।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 20 मई)

“जब कोई नहीं आता मेरे गुरुवर आते हैं,
मेरे दुःख के दिनों में वे बड़े काम आते हैं..”

पर हर समय तो गुरु रहते नहीं हैं ?
तब उनके उपदेश/ उनकी गाइडलाइन काम आती है।
सुख के दिनों में ?
सुख आया ही इसीलिए क्योंकि हम गुरु के बताए हुए रास्ते पर चल रहे थे।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 20 मई)

आचार्य श्री विद्यासागर जी…. उधारी 40 वर्ष पुरानी हो जाये तो खाते में से निकाल देते हैं।
शादी 40 साल तक नहीं हो तब तो ब्रह्मचर्य व्रत लेकर शादी के इरादे को समाप्त कर देना चाहिए।

मुनि श्री विनम्रसागर जी

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