हाथ पैर तो तैरने वाला भी मारता है और जिसे तैरना नहीं आता वो भी ।
फिर दूसरा ड़ूबता क्यों है ?
हाथ पैर सलीके से चलाना नहीं आता ।
सलीका आने के बाद तो हाथ पैर चलाना बंद करके भी वह तैरता रहता है, ड़ूबता नहीं है ।
ब्र. नीलेश भैया
एक गुण को भी यदि उत्कृष्ट बना लिया तो वह छोटे मोटे बहुत से अवगुणों को बहा देगा ।
जैसे नदी में कितने भी मगरमच्छ हों, एक छोटी सी नाव पार लगा देती है, शर्त यह है कि नाव मजबूत हो ।
चिंतन
दूसरों में झाँकना छोड़ो, अपने को आंकना शुरू करो ।
मुनि श्री प्रमाणसागर जी
Some people will pretend to care,
so they can get a better seat to watch you struggle.
Every helping hand, is NOT always there to help.
(Mr. Arvind Barjatya)
- कल पर्युषण पर्व चला गया ।
पर क्या सचमुच पर्व चला गया ?
जाता वही है जो पहले कभी आया हो ।
पर क्या पर्युषण पहले हमारे अंदर कभी आया था !
पहचान ?
यदि हमारे जीवन में बुराईयाँ कम हुई हों, गुण बढ़े हों, तो हमारे जीवन में वह पर्व आया था ।
- पर्युषण से पहले और बाद में क्षमा दिवस मनाते हैं ।
पूर्व की क्षमा इसलिये ताकि हमारे जीवन में नरमी/आद्रता आये ,धर्म का अंकुर पनप सके ,
बाद की क्षमा इसलिये ताकि धर्म हमारे जीवन में टिक सके, आद्रता बनी रह सके ।
- क्या हमारे जीवन में क्षमा आयी है ?
- पहचान ?
यदि हमारे दुश्मन कम हुये हैं और मित्र बढ़े हैं तो क्षमा हमारे जीवन में आयी है ।
हम सब संसार के सब जीवों से क्षमा भाव रखें और वे सब जीव हमें क्षमा करें ।
- संसार से विश्राम की दशा का नाम ही ब्रम्हचर्य है ।
- स्त्री के पीछे भागना और स्त्री से दूर भागना, बात एक ही है ।
जब तक ये यात्रा जारी है, समझो कि ब्रम्हचर्य की यात्रा अभी शुरू नहीं हुई है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
- दुनियाँ के सारे संबंधों के बीच, मैं अकेला हूँ यही भाव रखना आकिंचन धर्म का सूचक है ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
- कुछ मिलने की भावना से किसी से मिलोगे तो कुछ ना मिलेगा, छोड़ने की भावना से छोड़ोगे तो कुछ ना छोड़ पाओगे ।
- हमारा है क्या जो हम छोड़ने का अभिमान रख रहे हैं, हमारा तो शरीर भी अपना नहीं वो भी शमसान का है ।
- हमारी तो चेतना है, ज्ञान है उसे हम छोड़ नहीं सकते, यही आकिंचन धर्म हैं ।
- भोग विलास की चीजों और क्रोध, मान, माया, लोभ का त्याग सबसे बड़ा माना गया है और महत्वपूर्ण भी ।
- त्याग करने से लोभ और मोह कम होता है ।
- दान और त्याग में फर्क यह है की दान अपने लिये थोड़ा रख कर, थोड़ा दिया जाता है, जबकि त्याग में पूरा का पूरा छोड़ा जाता है ।
दान दूसरे की अपेक्षा से दिया जाता है, त्याग किसी की अपेक्षा से नहीं सिर्फ वस्तु को छोड़ा जाता है ।
दान प्रिय चीजों का होता है, जैसे – जीवन दान, ज्ञान दान, कन्या दान आदि ।
त्याग अप्रिय चीजों का जैसे – कमजोरियाँ, बुराईयाँ । - त्याग और दान, अहंकार और बदले की भावना से नहीं करना चाहिये ।
- तप यानि इच्छाओं का निरोध
जैसे चाय छोड़ना आसान है चाय की चाह छोड़ना मुश्किल, पहले चाह छोड़नी है तब चाय छोड़ें । - आचार्य श्री ने कहा – अपेक्षा निरोध: तप:
यानि लोगों से अपेक्षा नहीं रखें, वो तप हो गया । - तप तो संसार में भी करना पड़ता है, माँ को नौ माह गर्भ में, छात्र को, रोटी को, तो फिर सर्वोत्कृष्ट आत्मा को बिना तप के परमात्मा बनाना संभव है क्या ?
- बुराईओं से दूर रहते हैं
- पुण्यबंध होता है
- कर्म कटते हैं
- समाज में प्रतिष्ठा होती है
- और हमारी सामर्थ्य बढ़ती है
तप के बहुत फायदे हैं –
- संयम का मतलब होता है – आलंबन, बंधन ।
जैसे लता ,पेड़ के सहारे ,थोड़ा सा बंधन पाकर ,उन्नति को प्राप्त करती है, फलती फूलती है । - शर्त ये है कि उस लता में शुद्ध खाद और पानी ड़ाला जाये ,जो हमारी भावनाओं का हो ।
- ये बंधन निर्बंध करने में सहायक होता है ,
- आगे जब वो शक्ति पा लेती है तब उसे बंधनों की जरूरत नहीं रहती ।
- गगरी के गले में रस्सी बांधी जाती है तो वो उत्थान को प्राप्त होती है, पतन भी हो जाये उसका तो भी वो कीचड़ में से बाहर निकल आती है ।
- संकल्प से ही अच्छे संस्कार बनते हैं, टूटने के लिये तो किसी संकल्प की जरूरत नहीं होती ।
- सत्य परेशान होता है पर अंत में जीत सत्य की ही होती है ।
जैसे फिल्म में हीरो ढ़ाई घंटे पिटता है और आखिर के आधे घंटे विलेन मार खाता है/मर जाता है । - सत्य साधनों से मरता है, साधना से पनपता है ।
- सत्य कड़वा नहीं होता पर जब कषाय के लिफ़ाफ़े में रखकर इसे दिया जाता है तो कड़वा लगता है ।
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