रेगिस्तान है मोक्षमार्ग, एकाकी यात्रा ।
लौटने के लिये साथी चाहिए/बगीचा चाहिए ।
(या बगीचे/साथी की चाह पीछे लौटा देती है)

ब्र. नीलेश भैया

मोबाईल में दो कैमरे, एक आगे का फोटो खींचता है, दूसरा पीछे का ।
पर एक समय में एक और एक का ही ।
संसार की ओर मुख करोगे तो मोक्षमार्ग छूट जायेगा/दिखेगा ही नहीं ।

चिंतन

एक काफिला सफ़र के दौरान अँधेरी सुरंग से गुजर रहा था । उनके पैरों में कंकरियाँ चुभीं,
कुछ लोगों ने इस ख्याल से कि किसी और को ना चुभ जाये,
नेकी की खातिर उठाकर जेब में रख लीं ।
कुछ ने ज्यादा उठायीं कुछ ने कम।
जब अँधेरी सुरंग से बाहर आये तो देखा वो हीरे थे ।
जिन्होंने कम उठाये वो पछताए कि ज्यादा क्यों नहीं उठाये ।
जिन्होंने नहीं उठाए वो और पछताए ।
दुनियाँ में जिन्दगी की मिसाल इस अँधेरी सुरंग जैसी है और नेकी यहाँ कंकरियों की मानिंद है ।
इस जिंदगी में जो नेकी की वो आखिर में हीरे की तरह कीमती होगी और इन्सान तरसेगा कि और ज्यादा क्यों ना की ।

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