• सत्य परेशान होता है पर अंत में जीत सत्य की ही होती है ।
    जैसे फिल्म में हीरो ढ़ाई घंटे पिटता है और आखिर के आधे घंटे विलेन मार खाता है/मर जाता है ।
  • सत्य साधनों से मरता है, साधना से पनपता है ।
  • सत्य कड़वा नहीं होता पर जब कषाय के लिफ़ाफ़े में रखकर इसे दिया जाता है तो कड़वा लगता है ।

शौच यानि पवित्रता ।

पवित्रता कैसे आती है ?
जब हमारे मन से लोभ कम होता है, असंतुष्टि, आकांक्षायें, अतृप्ति कम होती हैं ।

पवित्रता किसकी ?
मन की, आत्मा की, शरीर की नहीं, शरीर तो अपवित्र रहे फिर भी मन अच्छा हो सकता है ।

एक बार गुरु नानक जी किसी के यहाँ खाने पर गये, जब उन्होंने रोटी तोड़ी तो उसमें से खून निकला, पता लगा वो जीव हिंसा का काम करता था, जानवरों को मारता था ।
उन्होंने संदेश दिया की कमाई करने में बुराई नहीं है, पर पसीने की खाओ ,खून की नहीं ।

कहते हैं कि – दिल बड़ा तो भाग्य बड़ा !!
सही है ,बड़े तालाब में गंदगी कम होगी, छोटे दिल में अटैक होने की संभावना अधिक ।

यानि मायाचारी का उल्टा, सरलता का धर्म ।
हम ये सोचते हैं की मायाचारी करके हम फायदे में हो जायेगें, कुछ समय तक तो अपने को फायदा लगता है, जैसे रावण ने सीता को हरा तो बहुत खुश हुआ ,पर उसका अंत कैसा हुआ ! शकुनी/दुर्योधन को देखो सबका अंत कैसा हुआ ?

मान करने से नीच गोत्र का बंध होता है, अपनी प्रशंसा, दूसरों की निंदा करना भी मान का ही रूप है।
मान को अपने जीवन से हटाने के लिये दूसरों के गुणों की प्रशंसा करें।

खाज को खुजाने में सुख तो है,
पर यह सांसारिक सुख है ।
खाज होना ही नहीं, आत्मिक सुख है ।

सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति में सुख है,
पर इच्छाऐं होना ही नहीं आत्मिक सुख ।

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