वस्तु का स्वभाव ही धर्म है ।

इस स्वभाव को पाने के लिये जो शुभ क्रियायें की जाती हैं वे भी धर्म हैं ।

भगवान/गुरू/शास्त्र को ऊँचे आसन पर क्यों बैठाते हैं ?
दीपक को ऊँचे आसन पर क्यों रखते हैं ?

ताकि प्रकाश अधिक से अधिक स्थान तक पहुँचे ।

मुनि श्री तरुणसागर जी

परवश में बहुत कुछ सहन करते हैं, स्ववश में कुछ भी नहीं,
तो परभव (भविष्य) में बहुत कुछ परवश सहन करना पड़ेगा।

मुनि श्री विश्रुतसागर जी

कर्म अपना फल ब्याज सहित देते हैं ।
क्योंकि वर्तमान के कर्म उसमें Addition कर देते हैं ।
ब्याज भी चक्रव्रद्धि,
क्योंकि पहले Addition के बाद जो योग आया उस पर आगे वर्तमान के कर्म फ़िर से Addition कर देते हैं ।

चिंतन

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