खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है ।
जैसी संगति वैसे बनोगे ।
मंदिर जाओगे भगवान जैसे, गुरूओं की सेवा में रहोगे त्याग/संयम के भाव बनेंगे ।
मुनि श्री विश्रुतसागर जी
“मौत को तो मैंने कभी देखा नहीं,
पर वो यकीनन बहुत खूबसूरत होगी ।
कमबख्त जो भी उससे मिलता है,
जिंदगी जीना ही छोड़ देता है” ।।
The ‘Result of Anger’ is more painful than the ‘Reason of Anger’…
Never forget these words to lead a Peaceful Life…!
शुद्ध घी तो घर का ही होता है, निकालना भी आता है, पर प्रमाद और समयाभाव से बाज़ार से लेते हैं ।
गुरू महनत करके ज्ञान रूपी घी हमें देते हैं ।
पर ध्यान रहे ऐसे गुरू से मत लेना जो नकली देता हो या खुद प्रमादी हो ।
चिंतन
हमें समतल होना होगा (कमजोरियों के गड़्ड़े भरने होंगे, घमंड़ के टीले ढ़हाने होंगे) तभी समता भाव आयेगा – प्रिय/अप्रिय से, सुख दु:ख में स्थिरता रहेगी ।
ब्र. नीलेश भैया
Daily make atleast two persons happy ,
but one of them must be YOU.
पेंट शर्ट पहनना क्यों छोड़ दिया ?
Race में दौड़ने वाले Uniform में रहते हैं,
दर्शक दीर्घा में बैठने वाले नहीं ।
चिंतन
साधूजन मौत को मौसी मानते हैं ।
श्री नवजोत सिंह सिद्दू
Do not ask God , what you desire but ask what you deserve.
You may deserve more than what you desire !
(Mr.Deepak Jaiswal)
सेठ हुकुमचंद्र जी के सात मिल थे, आठवें मिल खोलने से पहले उन्होनें अपनी पत्नी से सलाह ली ।
पत्नि – सात मिल सात नरक के कारण हो गये, अब आठवाँ खोल कर कहाँ जाओगे ?
ब्र. नीलेश भैया
पापोदय दु:ख को खाता है, पुण्योदय सुख को ।
श्रीमति साधना – मुम्बई
“If your eyes are positive, You will like the world.”
And
“If your tongue is positive, The world will like you.”
Mother Teresa
प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी ने अपनी मुनि अवस्था में 1920 से 1955 तक 35 वर्षों में, आहार सिर्फ 9 वर्ष 6 माह ही किया ।
(यानि 9938 दिन उपवास किये- मुनि श्री प्रमाण सागर जी 20-8-20)
चारित्र चक्रवर्ती
रुकते तो मेले में हैं, संसार के मेले में गति कहाँ ?
इसीलिये कहा है – रुकना मृत्यु है, मुक्ति से दूर होना है ।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
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