मन जल जैसा होता है – दोनों का स्वभाव नीचे की ओर जाने का है ।
दोनों को ऊपर उठाने के लिये पुरूषार्थ करना पड़ता है ।

व्यक्ति और व्यक्तित्व में उतना ही अंतर है, जितना जमीन और आसमान में ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

मनुष्य ही क्षमा धारण कर सकते हैं, देवता भी नहीं ।
देवता तो अमृत पीकर भी ईर्ष्या करते हैं ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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