एक सेठ ने अपने अंतिम समय में विशाल मीनार बनवाना शुरू किया। अलग-अलग प्रांतों से सबसे बेहतरीन ठेकेदारों को बुलाया गया। 1 साल का समय दिया। आर्थिक आदि किसी तरह की रुकावट नहीं थी फिर भी 3 महीने तक प्रगति नहीं हुई।
कारण ?
जब ईंट मांगी जाती तो पत्थर आ जाता क्योंकि अलग-अलग प्रांतों की भाषाएँ अलग-अलग हैं।
राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा होता है,फिर राष्ट्रीयता कैसे आएगी!

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 2 मार्च)

घर की पवित्रता मात्र अग्नि से ही नहीं होती है। अग्नि तो शमशान में सबसे ज्यादा है। पवित्रता तो घर में गुरुओं के चरण पड़ने से होती है, जिनके पवित्र उपदेश घर को पवित्र करते हैं। इसीलिए कहा है जिस घर में गुरु के चरण नहीं पड़ते वह घर शमशान है।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (जिज्ञासा समाधान – 1 मार्च)

3 प्रकार की बुद्धि –>

  • भरम बुद्धि – निर्वेग।
    एक चरवाहा 100 भेड़ें लेकर लौट रहा एक आगे चली गयी, दूसरी बहुत पीछे, 98 साथ थीं पर चरवाहा कभी आगे वाली को संभालता कभी पीछे वाली को, 98 से हाथ धो बैठा।
  • चरम बुद्धि – आवेग।
    Accident के बाद घड़ी की चिंता जबकि हाथ ही कट गया था।
  • नरम बुद्धि – संवेग।
    साधु प्रवृत्ति।

ब्र. डॉ. नीलेश भैया

लंका विजय के दौरान पुल बनाते समय हनुमान राम का नाम लिखकर पत्थर समुद्र में छोड़ते थे तो तैरने लगता था। राम ख़ुद पत्थर डालते थे तो डूब जाता था (जिसने राम को छोड़ दिया वह तो डूबेगा ही)।
यह चमत्कार देख लंकावासी बहुत प्रभावित हुए। रावण ने भी यह चमत्कार करके दिखाया उसका छोड़ा हुआ पत्थर भी समुद्र में तैर गया। कारण ? पत्थर छोड़ते समय वह कहता था तुझे राम की सौगंध डूबना मत।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 1 मार्च)

इच्छाओं को कैसे नियंत्रित करें ?
किसी मैदान में रेत बिखरी हुई है; उसका स्तर कैसे उठायें ?
रेत को समेट लें; स्तर उठ जाएगा।
इच्छाओं को भी नियंत्रित करने का यही तरीक़ा है कि उनको समेट लिया जाए।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 28 फ़रवरी- सेंट्रल जेल – ग्वालियर)

ज्ञानी अपराध होने पर सज़ा चाहता है/ मांगता है, मिलने पर खुश।
अज्ञानी सज़ा मिलने पर जेल तोड़कर भागना चाहता है।
जिन पर मुसीबत ज्यादा उनका नाम ज्यादा जैसे राम/ पार्श्वनाथ भगवान।
सुखी होना चाहते हो तो दु:ख में दुखी मत होना।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

तीन मित्र रोजाना साथ-साथ जाते थे। एक दिन एक मित्र पैसे देता था दूसरे/ तीसरे दिन दूसरे। पहला मित्र कम से कम पैसे देने की कोशिश करता था, दूसरा नॉर्मल और तीसरा दया करके उसको ऊपर से टिप भी देता था।

पहले दो न उदार हैं ना ही उनका उद्धार होगा, तीसरे का होगा। ऊपर से जब भी वह रिक्शावाला मिलता था तो मुस्करा के नमस्कार भी करता था।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन – 27 फ़रवरी)

चार कषायों में से पहली दो क्रोध और मान प्रत्यक्ष देखने में आती हैं, तीसरी मायाचारी कभी-कभी और चौथा लोभ तो समझ ही नहीं सकते/ पकड़ना बहुत मुश्किल है। उसे तो कषाय मानते भी नहीं पर वह जब दिखाई दे जाता है तब बहुत नीचा देखना पड़ता है।

मुनि श्री निश्चल सागर जी (प्रवचन- 27 फ़रवरी)

1-2 ग्राम का बीज अंकुरित होते समय टनों टन मिट्टी को हटाने का पुरुषार्थ कर लेता है। वह अंकुर हमेशा ऊपर उठता है, हमारे पुरुषार्थ भी उन्नत होते हैं। अंकुर पौधा बनता है फिर वृक्ष बनता है, यहाँ तक की सृजन क्रिया शांत होती है लेकिन जब वृक्ष गिरता है तो बहुत शोर होता है, यह है विसर्जन की क्रिया।
जब हम शांत होते हैं तो रचनात्मक स्थिति होती है और जब हमारे जीवन में अशांति/ अकुलता/ व्याकुलता होती है तो समझिए विसर्जन हो रहा है। किसान बीज बोते समय यह नहीं देखता कि बीज उल्टा पड़ रहा है या सीधा, वह सिर्फ देखता है कि उसकी जमीन उपजाऊ है या नहीं, यदि नहीं है तो उसके लिये प्रयास करता है। पर हम गुरु से उम्मीद करते हैं कि वो बीज बोये, अपनी जमीन को नहीं सुधारते/ उपजाऊ नहीं बनाते।

मुनि श्री सौम्य सागर जी (प्रवचन- 6 मई)

यंत्र – Material का सहारा जैसे लाउड स्पीकर।
मंत्र – अदृश्य शक्ति का सहारा लेकर कार्य सम्पादन।
तंत्र – भावात्मक शक्ति का सहारा लेकर कार्य सम्पादन।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

Archives

Archives
Recent Comments

April 8, 2022

September 2026
M T W T F S S
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
282930