समता की साधना और चारित्र की पवित्रता ही मोक्षमार्ग को प्रशस्त करती है ।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी

सबसे बड़ा ऐव संकोच है,
यही हमारे कल्याण में बाधक है ।
यह आता है, इस भाव से कि – हम सबको प्रसन्न रखें ।
पर हम भूल जाते हैं कि – ना हम किसी को प्रसन्न रख सकते, ना नाराज़,
सब अपने अपने कर्मोदय से सुखी-दुखी होते हैं ।

क्षु. गणेशप्रसाद वर्णी जी

एक कदम चलने वाला भी हजारों मील चल लेता है, कहीं से चलें तो सही ( प्रारंभ तो करें ) |

आचार्य श्री विद्यासागर जी

मोह पुण्य को पाप में परिवर्तित कर देता है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

(पुण्य से जो पुत्र आदि मिले हैं, उनसे मोह करके पाप ही तो अर्जित कर रहे हो !)

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