दर्द हमेशा अपने ही देते हैं,
वरना गैरों को क्या पता – आपको तकलीफ किससे होती है ।

(श्री श्रेयांस भैया)

वनस्पति घी खरीदते समय पूँछते हैं – यह असली तो है ना ?
नकली को असली मानने लगे हैं, क्योंकि आदत पड़ गयी है ।

हम भी मोह में संसार को अपना हितैषी मानने लगे हैं, असली यानि भगवान/धर्म को नहीं ।

चिंतन

धर्म की कुछ बातों पर विश्वास नहीं होता !
Homoeopathy पर जो लोग विश्वास नहीं करते वे भी दवा तो लेते हैं और रोग भी दूर होता है ।
दवा लेते रहें तो विश्वास भी आने लगेगा ।
जब विश्वास हो जायेगा तो रोग में फायदा भी ज्यादा होगा ।

चिंतन

रेडियो पर धार्मिक चर्चा सुनते सुनते यदि असावधानीवश सुई जरा सी हिल गयी तो Disturbance आने लगता है ।
धार्मिक क्रियायें करते समय जरा सी असावधानी हुई तो सुई हिलकर संसार के कार्यक्रम पर चली जायेगी ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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