जो वस्तु देखी ही नहीं या यदा-कदा देखोगे,
तो वैसे बनोगे कैसे ?

क्षु. श्री गणेश वर्णी जी

श्री आतिफ़ ( आशीषमणी) के मित्र  Canada में कार्यरत हैं, मुझसे मिलने बस से आ रहे थे जबकि घर में गाड़ीयां थीं ।

पूछने पर बताया – जब मैं अकेला चलता हूं, तब कार का प्रयोग नहीं करता हूँ और उससे जो बचत होती है वो पैसा मैं दान में देता हूँ । क्योंकि वो पैसा मैंने अपनी सुविधाओं को कम करके बचाया है, उस पर मेरे परिवार का अधिकार नहीं है ।
युवा आतिफ़ की ऐसी भावनाओं से हम भी कुछ सीखें !

गुलाब से पूछा – जब तुमको ड़ाली से तोड़ते हैं, तो तकलीफ नहीं होती ?

गुलाब – होती है, पर जब याद आता है कि मैं किसी की मुस्कान का कारण बनुंगा, तब तकलीफ समाप्त हो जाती है ।

(श्री मेहुल)

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