दूसरों पर दया करने की हमारी हैसियत ही नहीं है ।
आज जिस छोटे व्यक्ति पर आप दया कर रहे हो, ना जाने वही कल तुम पर दया करने के काबिल हो जाये ।

एक माँ दूसरे धर्मावलंबियों की Activities में जाने लगीं ।
उनके बेटे (मेहुल) ने दो – तीन दिन देखा फ़िर पूछा – अपना धर्म कब छोड़ रही हो ?
माँ ने जाना छोड़ दिया ।

गुरू जब शहर छोड़ कर जा रहे थे तब उस माँ ने पूछा था कि – आपकी Absence में जब कभी मैं भटक जाऊंगी तब कौन मुझे Guide करेगा ?
गुरू – तुम्हारे बच्चे तुम्हें Guide करेंगे ।माली अच्चे अच्छे बीज, भूमि को संस्कारित करके ड़ाल देता है, पेड़ बनकर वही बीज उसे जीवन पर्यंत स्वास्थवर्धक फल देते रहते हैं ।

आज वह माँ ऐसे अवसरों पर बच्चों में गुरू की आवाज मान कर उनका पालन करती है ।

उसी माँ के मुख से

छोटों को भी अपने कर्तव्यों को द्रढ़ता से निभाना चाहिये, चाहे वे बड़ों को अप्रिय क्यों ना लगें ।

जिसके जुड़ने / मिलने पर कार्य की सिद्धी होती है, उसे समवाय कहते हैं ।

इसके पांच अंग हैं और कार्य की सिद्धी के लिये पांचों ही आवश्यक हैं ।
1. – भव्यतव्य (क्षमता)
2. – पुरूषार्थ (महनत)
3. – उपादान (स्वभाव)
4. – निमित्त (बाह्य कारण)
5. – काललब्धि (नियति)

क्षु. श्री वर्णी जी

पुरूषार्थ और निमित्त के लिये वर्तमान में पुरूषार्थ किया जाता है,
जबकि बाकी तीन, Past के पुरूषार्थ से मिलते हैं ।

(यह वर्णी जी का चिंतन है, आगम में इसका उल्लेख नहीं मिलता – पं. रतनलाल बैनाड़ा जी)

किसी भी बड़ी से बड़ी मशीन का छोटे से छोटा पुर्ज़ा भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है, जितना बड़ा पुर्ज़ा ।
हर पुर्ज़ा अपना role पूरी efficiency से निभाता है तभी मशीन सही चल पाती है ।

इस दुनिया को चलाने में भी छोटे से छोटे आदमी का role, मशीन के छोटे पुर्ज़े की तरह ही महत्वपूर्ण है ।
यदि एक आदमी भी अपना role अपना कर्तव्य, सही नहीं अदा करेगा तो उसका असर आस-पास के सारे माहौल पर पड़ेगा ।

श्री नियाज़ अख्तर

जीवन बांसुरी जैसा है,
जिसमें बहुत से छेद (कमियाँ) हैं,
अंदर से खोखली है (सार नहीं है) ।

यदि सही छेद को, सही समय पर ऊँगली रखकर दबा दिया जाये,
तो इसी खोखलेपन से धर्म का / मोक्ष का मधुर संगीत निकलने लगता है ।

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