निर्वाण और निर्माण दौनों में ही ईंट पत्थर जमा किये जाते हैं ।
निर्माण में अधिक से अधिक जगह को चारों ओर से घेरा जाता है, खुले आकाश को चुराया जाता है ।
निर्वाण में भी गुणों के ईंट पत्थर जमा करके वेदी बनती है, ऊंचाईयां पाई जाती हैं, पर कम से कम जगह पर बैठा जाता है, अपना भी दूसरों को दे दिया जाता है ।

निर्माण में दोष है, तभी तो वास्तु की पूजा करके उसकी शुद्धि की जाती है,
निर्वाण में दोष दूर किये जाते हैं, तभी तो सब उनकी पूजा करते हैं ।

वेदी पर भी भगवान बिना Touch किये ऊंचाई पर बैठते हैं और अंत में सबसे ऊंची जगह सिद्धालय/मोक्ष पहुंच जाते हैं ।
वहाँ पहुंच कर तो शरीर के बराबर जगह भी उनकी अपनी नहीं होती है, सारा आकाश सबका होता है, सबको अपने में समाहित करने की भावना होती है, किसी को अपने आश्रित करने का भाव नहीं होता है ।

जो इस भावना वाले हैं वो निर्वाण की ओर बढ़ रहे हैं ।
जो इस भावना के नहीं हैं वे निर्माण की ओर, अपने चारों ओर कर्मों की घेराबंदी कर रहे हैं ।

ऐसी ही निर्वाण की प्रक्रिया करके महावीर भगवान आज अमावस्या के दिन मोक्ष पधारे थे ।

चिंतन

विजय के बाद अपने घर की वापसी के महोत्सव को श्री राम और महावीर भगवान की तरह हम भी अपनी कमजोरियों पर विजय प्राप्त करके, उल्लास के साथ मनायें ।
दीपमालिका सबके जीवन में शांति और आनंद का प्रकाश भर दे ।

चिंतन

क्या आप करोड़ों इंसानों को आग में जला कर तड़पा-तड़पा कर मारना चाहेंगे ?
नहीं ना ।
तो आप उन करोड़ों जीवों को क्यों नहीं महसूस करते जो इस दिवाली पर आपके द्वारा मारे जायेंगे ?
जीव सब समान हैं, बस रूप अलग अलग हैं ।

पटाखों का इस्तेमाल ना करें, इनसे वायु तथा ध्वनि प्रदूषण भी बहुत फैलता है ।

जियो और जीने दो !

(श्री आशीष मणी जैन)

हीनता का भाव भी अहंकार पैदा करता है ।
दूसरे के सम्मान में अपना अपमान मानना भी अहंकार है ।

मुनि श्री क्षमासागर जी

शास्त्रों के अनुसार पत्नी अनुगामिनी होती है,
पर आजकल तो देखा जाता है कि पति पत्नी को Follow करते हैं,
ऐसा क्यों ?
क्योंकि आजकल पत्नियां पतियों से ज्यादा धर्मध्यान करतीं हैं,
इसीलिये उनका बोलबाला रहता है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

भक्त की प्रार्थना से खुश होकर देव प्रकट हुये,
वरदान मांगने को कहा पर शर्त यह थी – जो भी तुम्हें दुंगा, उसका दुगना पड़ौसी को मिलेगा ।
भक्त ने मांगा – मेरी एक आंख फूट जाये ।

क्रोध से बचने के उपाय –

  • विलम्ब करें ।
  • कारणों और औचित्य पर विचार करें ।
  • सकारात्मक सोचें ।
  • वातावरण को हल्का बनाऐं ।

मुनि श्री क्षमासागर जी

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