सिंगापुर में एक मित्र हमेशा एक नं. छोटा जूता पहनते थे ।
पूछने पर ज़बाब दिया – जब Office से घर आकर जूता उतारता हूँ, तो बहुत सुख और सुकून मिलता है ।
श्री तन्मय
संसारी सुख भी ऐसा ही है – थोड़े से सुख के लिये पूरी ज़िंदगी हम परेशानियां झेलते रहते हैं ।
गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पांव ?
बलिहारी गुरू आपकी, गोविन्द दियो बताय ।
आचार्य श्री – सच्चे गुरू गोविंद बताते नहीं है, आपको गोविंद बनने की कला सिखाते हैं ।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
ये Factory कितनी अद्भुत है कि एक तरफ़ से बुढ़्ढ़े, बुढ़ियों को ड़ाला जाता है और दूसरी तरफ़ से गुड़्ड़े, गुड़ियां निकल कर सामने आते हैं ।
फिर मृत्युभय कैसा ?
हमें तो मृत्यु का स्वागत करना चाहिये ।
कर्म बांधना चाहते हो या काटना ?
पर Action तो सारे बांधने के हैं !
सर्दी लगी – ऊनी कपड़े पहन लिये,
गर्मी लगी – कूलर चला लिया,
गाली सुनी तो, 2 दे दीं,
भूख/प्यास लगी तो खाना खा लिया, पानी पी लिया ।
तो कर्म कटेंगे कैसे ?
थोड़ा संयम/ सहनशक्ति तो पैदा करो ।
When you reach for stars, you may not quite get them, but you won’t come up with a handful of mud either.
10 बाह्य – क्षेत्र, वास्तु, धन, धान्य, द्विपद, चतुष्पद, यान, कुप्य (वस्त्र), भांड़ (बर्तन), शय्यासन ।
14 अंतरंग – मिथ्यात्व, 4 कषाय, 9 अकषाय ।
अभक्ष्य – 5 प्रकार के हैं ।
1. त्रसघात – द्विदल, अमर्यादित भोजन
2. बहुघात – जैसे आलू आदि
3. अनिष्ट – सेहत के लिये नुकसानदायक
4. अनुपसेव्य – मूत्र आदि
5. प्रमादकारक – अफीम आदि
आचार्य श्री एक बार किसी गरीब के घर आहार के लिये गये, रोटियों के बर्तन में 6 रोटियाँ थीं, उन्होंने 2 रोटी खाने के बाद अंजुली छोड़ दी । ताकि चौके वाले पति-पत्नि को उनके हिस्से की 2-2 रोटियाँ मिल सकें ।
Appetite comes with eating.
स्नेह के संसर्ग (तेल) के कारण ही तिल को घानी में पिलना पड़ता है ।
दुश्मन ताकतवर हो तो हमला दोनों ओर से करें – बाहर से क्रियायें, अंदर से भी चिंतन आदि,
जैसे राजधानी (मन) में जासूस भेजे जाते हैं,
बाह्य और अंतरंग (जासूसों) में Communication Establish होना चाहिये वरना दुश्मन (अनादि संस्कार/कर्म) हारेगा नहीं,
राजधानी को जीतने के लिये, बाह्य छुटपुट किले जीतने से काम नहीं चलेगा ।
चिंतन
महावीर भगवान की जयन्ती पर
अहिंसा
अपरिग्रह
अनेकांत
आत्मस्वतन्त्रता
आपके जीवन में जयवंत हो ।
दान त्याग से पहले की स्थिति है ।
दान आंशिक है तथा त्याग पूर्ण है ।
नहीं छोड़ोगे तो छूट जायेगा ।
चेतन का भान होने पर, जड़ का महत्व कम हो जाता है ।
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