एक चोर को सेठ ने रात को चोरी करते हुये देख लिया ।
अगले दिन एक दावत में सेठ पंगत में बैठा, पास में ही वह चोर भी बैठा था । सेठ को शक हो गया ।
सेठ बार बार पूछता था – क्या रात को तू ही था ?
चोर सिर हिला कर मना करता रहा ।
मिष्ठान/पकवान परोसने वाले समझते कि इसे मिष्ठान/पकवान नहीं चाहिये और वे बिना परोसे आगे बढ़ते जाते ।

हम भी पूर्व के चोर हैं, मना करते रहते हैं और गुरूजन हितोपदेश ( मिष्ठान/पकवान ) बिना दिये आगे बढ़ जाते हैं ।

Octopus पंचेद्रिय संज्ञी जीव होता है ।
TV News है कि जर्मनी का एक Octopus football world cup matches में सही भविष्यवाणी कर रहा है ।

आगम के अनुसार – कोई आपत्ति नहीं है ।
उसे अवधिज्ञान हो सकता है ।

एक पंड़ित जी, मुझे लेकर साहू शांति प्रसाद जी से मिलने गये ।
साहू जी अधिकतर समय अपनी व्यस्तता का बखान करते रहे कि मेरा एक पैर जमीन पर तो दूसरा आसमान (हवाई जहाज) में ही रहता है ।
पंड़ित जी ने बाहर निकल कर कहा – लगता है, इनके खराब दिन आने वाले हैं ।
6 माह बाद पंड़ित जी का पत्र आया कि साहू जी को लकवा मार गया है, मल मूत्र विसर्जन भी बिस्तर पर ही हो रहा है । उसी हालात में उनका निधन हो गया ।

श्री लालमणी भाई

एक माँ दूसरे धर्मावलंबियों की Activities में जाने लगीं ।
उनके बेटे (मेहुल) ने दो – तीन दिन देखा फ़िर पूछा – अपना धर्म कब छोड़ रही हो ?
माँ ने जाना छोड़ दिया ।

गुरू जब शहर छोड़ कर जा रहे थे तब उस माँ ने पूछा था कि – आपकी Absence में जब कभी मैं भटक जाऊंगी तब कौन मुझे Guide करेगा ?
गुरू – तुम्हारे बच्चे तुम्हें Guide करेंगे ।माली अच्चे अच्छे बीज, भूमि को संस्कारित करके ड़ाल देता है, पेड़ बनकर वही बीज उसे जीवन पर्यंत स्वास्थवर्धक फल देते रहते हैं ।

आज वह माँ ऐसे अवसरों पर बच्चों में गुरू की आवाज मान कर उनका पालन करती है ।

उसी माँ के मुख से

छोटों को भी अपने कर्तव्यों को द्रढ़ता से निभाना चाहिये, चाहे वे बड़ों को अप्रिय क्यों ना लगें ।

जिसके जुड़ने / मिलने पर कार्य की सिद्धी होती है, उसे समवाय कहते हैं ।

इसके पांच अंग हैं और कार्य की सिद्धी के लिये पांचों ही आवश्यक हैं ।
1. – भव्यतव्य (क्षमता)
2. – पुरूषार्थ (महनत)
3. – उपादान (स्वभाव)
4. – निमित्त (बाह्य कारण)
5. – काललब्धि (नियति)

क्षु. श्री वर्णी जी

पुरूषार्थ और निमित्त के लिये वर्तमान में पुरूषार्थ किया जाता है,
जबकि बाकी तीन, Past के पुरूषार्थ से मिलते हैं ।

(यह वर्णी जी का चिंतन है, आगम में इसका उल्लेख नहीं मिलता – पं. रतनलाल बैनाड़ा जी)

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