एक दुःखी आदमी देवता के पास जाकर बहुत दुःखी हुआ, उसकी शिकायत थी कि इस दुनिया में सबसे ज्यादा दुःख  मुझे ही क्यों मिले हैं ?

देव ने सलाह दी कि उसके शहर में एक Exhibition होने वाली है जिसमें सब दुःखी लोग अपने अपने  दुःखों की पोटलियां लटका देगें और अगले दिन वो पोटलियां Exchange करने का Chance दिया जायेगा । तुम सब से पहले जाकर सबसे छोटी पोटली लेकर चले जाना ।
अगले दिन वह आदमी अपनी ही पोटली उठाकर चला गया ।

हम अपने दुःखों को तो बढ़ाकर और दूसरों को दुःखों को कम करके देखते हैं,
पर  Interchange करने को तैयार नहीं होते हैं ।

मुनि श्री क्षमासागर जी

सीता को रिझाने के लिये रावण के सारे प्रयास असफल होने पर मंत्रियों ने सलाह दी – आपको तो बहुरूपणी विद्या आती है, आप राम का रूप रखकर सीता को अपने महल में ले आओ ।
रावण – राम का रूप रखा था, पर जैसे ही मैं राम का रूप रखता हूँ, मेरे भाव ही बदल जाते हैं ।

( प्रो. जया )

नकली रूप रखने से भावों में इतना परिवर्तन ! तो असली रूप वालों के कैसे भाव होते होंगे !

आचार्य शांतिसागर जी महाराज को आहार देते समय अम्मा जी से कोई त्रुटि हो गई।
प्रायश्चित पूछ्ने पर पंड़ित जी ने बताया  तो उन्होंने किसी दुसरे महाराज के एटा आने पर भरी सभा में रोते हुये अपनी गलती स्वीकारी,
सब लोगों ने Criticize भी किया, पर मुनि महाराज ने कहा कि तुम्हारा प्रायश्चित तो हो गया ।

पाप को 10 लोगों को बता दो तो वह कम हो जाता है, ऐसे ही पुण्य को 10 लोगों को बखान करो तो वह भी कम हो जाता है ।

एक आदमी बस में गंदी सीट पर बैठा और पीठ में दर्द कर लिया ।
घर आने पर उसको पूछा – आपने अपनी सीट किसी से बदल क्यों नहीं ली ?
वह बोला – बस में कोई था ही नहीं, बदलता किससे !

मुनि श्री वैराग्यसागर जी

दुःख के लिये रोते तो हैं पर उसे दूर करने का उपाय नहीं करते, जबकि उपाय Available हैं |

हम शरीर के निकट तो हैं पर उससे हमारा परिचय नहीं है ।
हमारा व्यक्तित्व पेट और पेटी बनकर रह गया है, उसी को हमने अपना परिचय मान लिया है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

आचार्य श्री विद्यासागर जी के संघ का विहार चल रहा था, बाहर कहीं एक गाना चल रहा था, “दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समायी, तूने काहे को दुनिया बनायी”,
आचार्य श्री विद्यासागर जी ने कहा कि ऐसे कहो “दुनिया बसाने वाले क्या तेरे मन में समायी, तूने काहे को दुनिया बसायी” ।

प्रशंसा चाहना तथा 3 गारव – 1 ऋद्धि ( इष्ट द्रव्य का लाभ ), 2 रस ( मिष्ट भोजन आदि की प्राप्ति ), 3 सात ( सुखद शयनादि स्थान ) में द्रढ़ चित्त वाले को ।

कर्मकांड़ गाथा : – 808

साधु को जंगल में एक बूढ़ी लोमड़ी दिखाई दी, जिसके चारौ पैर नहीं थे, साधु परेशान – ये ज़िंदा कैसे है? खाती कैसे है? इतने में एक शेर आया, मुँह से खाना उगला, लोमड़ी ने खाना खाया, शेर चला गया।

साधु को उस नाचीज़ लोमड़ी के खाने और सुरक्षा के इंतज़ाम को देख, दैवीय शक्ति पर पूर्ण विश्वास हो गया। वह भी पास में ही नियम लेकर बैठ गया कि अब तो मेरे भोजन/सुरक्षा का इंतज़ाम देवता ही करेंगे। बहुत दिन निकल गये देव ने कुछ नहीं किया, साधू नाराज हो, देव को बुरा भला कहने लगा।

देव प्रकट हुये और पूंछा नाराज क्यों हो रहे हो ?

साधु – तुम इस लोमड़ी के लिये तो सब इंतज़ाम करते हो पर सबसे श्रेष्ठ कृति, इस मनुष्य के लिये कुछ नहीं किया,  तीन दिन से भूखा बैठा हुआ हूँ।

देव बोले कि लोमड़ी से क्यों अपनी तुलना करते हो, तुमको तो हाथ, पैर, बुद्धि, सब मिला है, तुम तो शेर से भी श्रेष्ठ हो, अपना इंतज़ाम खुद कर सकते हो, शेर की तरह दूसरे निर्बलों का भी उपकार कर सकते हो, देव का मुँह क्यों ताकते हो !! पुरूषार्थ करो।

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