दुनिया उसको कहते भैया जो माटी का खिलौना* है,
मिल जाए तो माटी** भैया, ना मिले तो सोना*** है।

आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी(29 अक्टूबर)

* मात्र खेलने के लिए, यथार्थ में कोई कीमत नहीं।
** प्राप्त की कोई कीमत नहीं।
*** अप्राप्त बहुत कीमती और आकर्षक लगता है।

वैराग्य से संसार छूटता है।
तत्वज्ञान* से मोक्षमार्ग पर बने रहते हैं।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

* धर्म का ज्ञान।

प्रश्न यह नहीं कि आपके पास शक्ति, सामग्री, संपत्ति कितनी है ! प्रश्न है कि व्यक्ति कैसा है!! क्योंकि यह तीनों तो अधम को भी प्राप्त हो जाती हैं। आज के साधन प्राय: अवनति के कारण हैं, विरले ही लोग उनके होते हुए प्रगति करते हैं।
पिछले जन्म से रत्न की गाड़ी भर के लाए थे, कचरा भर के ले जा रहे हैं। प्रश्न यह नहीं की सीढ़ी है या नहीं, प्रश्न यह है की सीढ़ी लगी कहाँ है ? कुएं के पास या छत के पास, नीचे ले जाने को या ऊपर जाने को !
व्यक्त नहीं अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण है/ अभिप्राय महत्वपूर्ण है। मंदिर जाने का विचार इसलिए किया क्योंकि डॉक्टर ने कहा था (सेहत बनाने को) व्यक्त तो सही लग रहा है लेकिन आपका अभिप्राय उच्च नहीं।

आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी

जैसे नख और केश बार-बार उग आते हैं, वैसे ही कर्मोदय है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

(जैसे नख/ केश को बार-बार काटना पड़ता है ऐसे ही कर्मों को बार-बार कम करना पड़ेगा वरना मैल भर जाएगा, बीमारियां पैदा होंगी/ दु:ख पैदा होंगे)।

पार्किंसंस रोग होने पर हाथ काँपने को रोकने के लिये कहते हैं –> “साधौ”।
चलायमान विचारों को रोकने को साधना कहते हैं।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

शिष्य की शिक्षा पूर्ण होने पर गुरु ने तीन चीज़ें शिष्य को दीं…
1) दीपक… जो खुद जलता है/ दूसरों को प्रकाश देता है पर अहंकार नहीं करता।
2) सुई… जो खुद उघाड़ी रहती है पर दूसरों को ढकती है/ जोड़ती है।
3) बाल… मृदुता और सरलता का प्रतीक।

आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी (3 नवम्बर)

किसी का लोटा आपके पास आने तथा मालिक के द्वारा पहचाने जाने पर लोटा लौटाना त्याग नहीं है।
गरीब को लोटा देना त्याग है। क्योंकि आपने न किसी के डर से, नाही कुछ Return में पाने की भावना से लौटा दिया है।

शांतिपथ प्रदर्थक

ऐसे सचित्त* शब्दों को मत बोलो जिससे दूसरे का चित्त उखड़ जाये।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

*कीड़ों सहित (जहरीले)।

कठिन क्या है धर्म करना या धन कमाना ?
प्राय: उत्तर मिलता है… धर्म करना कठिन है।
पर कभी सोचा ! धन कमाने में कितना दिमाग लगता है, कितनी मायाचारी करनी पड़ती है, कितने अच्छे बुरे लोगों से व्यवहार करना पड़ता है। जबकि धर्म करने वालों में इसका उल्टा होता है।
कारण एक है… जो हम कर लेते हैं वह हमको सरल लगता है जैसे पुरुष बाहर के काम करता है, उसे रोटी बनाना बहुत कठिन लगता है।
धर्म करने की भावना बनते ही आनंद और शांति आने लगती है, करते समय भी, करने के बाद भी बहुत देर तक। क्योंकि यह खुद का काम लगता है।

आर्यिका श्री पूर्णमति माता जी (29 अक्टूबर)

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