Do not be too hard, lest (ऐसा न हो) you be broken.
(J.L.Jain)
शरीर देवालय है, आत्मा देव।
देव की पूजा/ साधना के लिये देवालय होता है।
पर प्रीति तो देव से ही,
देवालय से न प्रीति ना ही द्वेष।
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
अतीत का तो मरण हो चुका है। पर हम स्वीकारते नहीं, उसमें बार-बार, घुस-घुस कर सुखी/ दुखी होते रहते हैं।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
एक बहुत गरीब पिता के बेटे के IAS बनने के अनुभव/ शिक्षा…..
जीवन में कठिनाइयाँ हैं/ आयेंगी, उनसे संघर्ष का नाम ही जीवन है।
दु:ख अलग है जैसे प्रियजन का विछोह।
कठिनाइयों से दुखी न होकर संघर्ष करने वाला ही सफल/ संतुष्ट होता है।
इंद्रजीत सिन्हा (IAS)- झारखण्ड
“मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती…”
यानी खेती वह जिसमें हीरे मोती पैदा होते हों।
मछली आदि की खेती कैसे हो गयी ?
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
कोठी में छप्पर नहीं तो ऊपर वाला छप्पर फाड़ कर कैसे देगा !
आचार्य श्री विद्यासागर जी
भाग्य तो पापी के पास में भी होता है।
पुरुषार्थ पुण्यात्मा के ही।
चिंतन
अपना सोचा,
ना हो, अफसोस है*,
फिर भी सोचो**।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
(* होगा वही जो भाग्य में लिखा है।
** क्योंकि पुरुषार्थ करना ही है)
“साँच को आँच नहीं” कहावत कथंचित सीता जी की अग्नि परीक्षा से प्रेरित है, जब उनको अग्निकुण्ड में आँच तक नहीं आयी थी।
निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
आइंस्टिन के पास एक भारतीय गया और एक खेल शुरू किया → आइंस्टिन एक प्रश्न रखेंगे यदि भारतीय जबाब नहीं दे पाया तो उसे 5 डालर देने होंगे।
भारतीय प्रश्न करेगा, जवाब न दे पाने पर 500 डालर देने होंगे।
आइंस्टिन ने चांद की दूरी पूछी, भारतीय जबाब नहीं दे पाया सो 5 डालर दे दिये।
भारतीय ने प्रश्न किया → वह कौन है जो 3 पैरों से पहाड़ पर चढ़ जाता है पर उतरता 4 पैरों से है ?
आइंस्टिन ने 500 डालर देकर, वही प्रश्न भारतीय पर दाग दिया।
भारतीय ने बिना सोचे 5 डालर दे दिये । 490 डॉलर लेकर चला गया।
(अरविंद)
ना, मत बोलो,
“हाँ” की कूबत देखो,
दंग रह जा।
आचार्य श्री विद्यासागर जी
भगवान से बल मांगते हैं, क्या वे बल देते हैं ?
कमज़ोर आदमी का स्मरण/ संगति से कमज़ोर होने लगते हैं। हनुमान भक्त युद्ध में “जय बजरंग बली” के नारे से ऊर्जा ग्रहण करते हैं। तो सर्वशक्तिमान के नाम से शक्ति नहीं महसूस होगी !
चिंतन
अच्छाई के माध्यम से ही सच्चाई का दर्शन होता है।
मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
चीते और कुत्ते की दौड़ में, कुत्ता जी-जान से दौड़ा पर चीता दौड़ा ही नहीं।
कारण ?
चीते को अपनी Superiority सिद्ध करने की ज़रूरत ही नहीं थी।
(हम क्या सिद्ध करने में अपने जीवन को दांव पर लगा रहे हैं ?
कि हम मनुष्य हैं ?? सर्वश्रेष्ठ Category के हैं ??)
(डॉ. पी.एन.जैन)
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