कर्म, धर्म की ओर ले जाता है,
धर्म, कर्म को अनुशासित करता है।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

क्या देवदर्शन टी.वी. पर करने से काम चलेगा ?

क्या पिता के जीवित रहते, उनके दर्शन फोटो पर करने से काम चलेगा?
साक्षात दर्शन के बराबर Energy मिलेगी क्या ??”
क्या यह अपशगुन नहीं माना जायेगा ???

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी)

दया/ सेवा नींव है।
Ritual इमारत, Spirituality शिखर।
बिना नींव के इमारत बनेगी नहीं, सिर्फ नींव इमारत कहलायेगी नहीं ।
बिना शिखर के धार्मिक इमारत नहीं कहलायेगी।

चिंतन

सल्लेखना के आखिरी 4 साल में शरीर को कष्ट सहिष्णु बनाना होता है, इससे सहन शक्ति बढ़ती है/ शरीर आरामतलब नहीं बनता है।
फिर रसों (मीठा/ नमकीनादि) को छोड़ते हैं। तब छाछ, तत्पश्चात जल, अंत में उसका भी त्याग कर देते हैं।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी)

पहले साधु बनने का उपदेश क्यों दिया जाता है ?
पहले मंहगा/ कीमती माल ग्राहक को दिखाया जाता है, यदि चल गया तो बड़ा फायदा (दोनों पक्षों को)।
न चल पाये तो सस्ता माल दिखाया जाता है (छोटे-छोटे नियम)।

गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी)

एक बार जब कोई धोखा देता है तो हमें गुस्सा आता है।
किन्तु मोह हमें जीवन-भर धोखा देता रहा उस पर हमें प्रेम क्यों आता है !!

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

सूरज उनको भी प्रकाशित करता है जो उसे सम्मान नहीं देते। बस प्रकाश को ग्रहण करने का पुण्य होना चाहिये (आँखों में देखने की क्षमता) ।
साधु उस स्थान/ समाज में भी जाते हैं जहाँ उनको मानने वाले नहीं होते हैं।

निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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