ज़िंदगी जो “शेष” बची है, उसे “विशेष” बनाइये वरना उसे “अवशेष” बनने में देर नहीं लगेगी।

(डॉ. सविता उपाध्याय)

मैं खोज रहा था प्रभु को वे खोज रहे थे मुझे। अचानक एक दिन मिल गए।
न मैं झुका, न वे झुके। न वे बड़े थे, न मैं लघु था।
एक आवरण मुझे उनसे विभक्त किए था, वह हटा और मैं भगवान बन गया।
अपने से नाता जोड़ लो फिर किसी और को खोजने की जरूरत नहीं।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

तीर्थयात्रा से लौटने पर कहा गया… आपके जाने से सूना हो गया था।
भगवान के जाने पर मंदिर सूने नहीं हुए। क्योंकि वहाँ भगवान के बिम्ब के अभाव में उनका प्रतिबिम्ब बना लिया। मेरे अभाव में मेरे द्वारा जो शुभ क्रिया होती हैं उनका प्रतिबिम्ब यदि बना लें/ वही काम(स्वाध्याय) आप या कोई और करने लगे, तो सूनापन नहीं लगेगा।

चिंतन

दहला देता था वीरों को, जिनका एक इशारा;
जिनकी उंगली पर नचता था, ये भूमंडल सारा।
कल तक थे जो वीर, धीर, रणधीर अमर सैनानी;
मरते वक्त न पाया उनने, चुल्लू भर भी पानी।।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

चक्रवर्तियों का अंत भी दुखद देखा गया है।
जानवर पालना आसान है, मुगालता पालना कठिन।
आज पुण्य के उदय से निरोगी काया है, माया, कुलवंती नारी, पुत्र आज्ञाकारी है, पर ये हमेशा नहीं बने रहेंगे।
कुटुम्बादि आसाता का उपाय – शब्दों/ वचन का वास्तु ठीक करने से सब ठीक हो जाता है।

मुनि श्री विनम्रसागर जी

छूटने की कल्पना से ही भय होता है, वैभव/ शरीर/ प्रियजनों के छूटने का भय।
यदि इन सबको नश्वर मान लो और आत्मा को अनश्वर तो भय समाप्त।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

मन कोमल होता है तब ही तो आकार ले लेता है गर्म लोहे की तरह,
झुक जाता है तूफानों में।
घुल जाता है अपनों में या अपने में।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

चाह बुरी नहीं, यह तो नाव की गति के लिये आवश्यक जलप्रवाह है। पर वह प्रवाह बाढ़ नहीं बननी चाहिए वरना जीवन की नाव डूब/ भटक जाएगी।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

पथ्य* जो पथ में लिया जाता है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

* रास्ते के लिए भोजन सामाग्री/ अगले जन्म को जाते समय पुण्य कर्म।

भगवान के अनंत गुणों में से उस गुण की चाह करें जो हमारी कमजोरी हो।
आज तक बस गुणगान करते रहे, इसलिए भगवान का कोई गुण हम में आ नहीं पाया।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

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