Month: December 2025
साता/असाता
शुद्ध निश्चय नय से कर्म, कर्म में है, “मैं अपने में” ऐसा ज्ञानी सोचता है। तब उसे सुख-दु:ख में हर्ष-विषाद नहीं होता है। इस प्रकार
शरीर / आत्मा
क्या हम ऐसी जगह को छोड़ना नहीं चाहेंगे जहाँ सड़न/ बदबू आना शुरु हो रही हो? यदि हाँ तो आत्मा मरते हुये शरीर को क्यों
नरक यहीं है
राजर्षि अमोघवर्ष कृत नीति ग्रंथ ‘प्रश्नोत्तर-रत्नमालिका’ से- “नरक क्या है?” “जहाँ सब कुछ परवश होकर किया जाता है।” सुख भी यदि परवश हो, तो सुख
परिग्रह
पाँचों पाप रोग-रूप हैं। हिंसा, झूठ, चोरी और कुशील के तो लक्षण दिखते हैं और उनका इलाज सम्भव है, पर परिग्रह के लक्षण अंतरंग हैं।
इच्छा / उद्देश्य
इच्छा/ उद्देश्य किन का पूरा हो सकता है ? उद्देश्य पुण्यात्मा/ सम्यग्दृष्टि का ही पूरा हो सकता है। इच्छा मकान बनाने की कोई भी कर
अंगदान
अंगदान… करुणा, अभय, औषधि (निरोग करना) दान में आयेगा। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जिज्ञासा समाधान – 5-4-22)
दूध उबालना
दूध को 2-3 बार से ज्यादा नहीं उबालना चाहिये। क्योंकि अत्यंत गर्म होने पर अत्यंत गर्म प्रकृति वाले जीव और पैदा हो जाते हैं। क्षु.श्री
ट्रेन पकड़ना
1st Compartment में Reservation है (मनुष्य हो न!), पर स्टेशन पर लेट पहुँचे(इस जीवन का अधिकतर समय तो विषय भोगों में बर्बाद ही कर दिया),
द्वीप / समुद्र
द्वीप/ समुद्र असंख्यात हैं पर नाम संख्यात ही हैं। इसलिये द्वीप/ समुद्रों के नाम असंख्यात बार Repeat होते हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र
व्यक्त्ति
साधना की पृष्ठभूमि…….विरक्त्ति, आराधना की पृष्ठभूमि…अनुरक्त्ति, शब्द अपने आप में…अभिव्यक्त्ति, मौन…………………… व्यक्त्ति है। गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी
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