Month: December 2025
नियतिवाद
ईश्वरवाद से भी घटिया नियतिवाद है। क्योंकि ईश्वरवाद में नियति को बदलने का अधिकार एक (ईश्वर) को तो है। ब्र. डॉ. नीलेश भैया
संयम
खुले जंगल/ पहाड़ी पर रहने वाले लोग भी बाउंड्री खींच/ बना लेते हैं। लाभ ? स्वामित्व का अधिकार पा ही लेते हैं। ब्र. डॉ. नीलेश
सफाई
भवन में कचरे की सफाई नहीं, तो जीवन का विकास नहीं। कचरा साफ भी करते हैं तो देश-संयम की तरह कोने में जमा कर देते
किसके पीछे?
कौन किसके पीछे भागता है? घर वालों के पीछे पाप या पाप के पीछे घर वाले? बड़े तो पाप के पीछे ही भागते हैं इसलिये
भेद-अभेद
भेद – मेरे शरीर में दर्द है। अभेद – मैं मर जाऊँगा (मिथ्यात्व)। जैसे बुंदेलखंड आदि में ‘स’, ‘श’, ‘ष’ बोलने में भेद नहीं करते
निरंतरता
यदि धर्म पुस्तकों पर बहुत दिनों तक दिमाग(Dimag) न लगाया जाए तो, उन पर दीमग(Demag)(दीमक) लग जाती है। दीमग(दीमक) का स्वभाव होता है कि वह
अनर्थ-दंड
व्यर्थ नहीं वह साधना, जिसमें नहीं अनर्थ*। भले मोक्ष हो देर से, दूर रहे अद्य-गर्त।। आचार्य श्री विद्यासागर जी (सर्वोदय शतक) *अनर्थ-दंड।
कषाय
चारों कषायें इंटरचेंजेबल हैं। मान की पूर्ति नहीं होती तो क्रोध आ जाता है, क्रोध से सफलता नहीं मिलती तो मायाचारी करने का लोभ आता
भोगभूमिज
भोगभूमजियों में पुरुष का मरण जम्हाई से होता है, स्त्रियों का छींक से। छींक में कम समय लगता है, जम्हाई में ज्यादा। इससे पुरुष की
परम्परा
परम्परा का कर्ज़ लिया नहीं चुकाना होता है। प्रो. शर्मा जी – जब दिगम्बर साधु न हों तब नकली साधु बनाकर इस परम्परा को बनाये
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