Month: March 2026
द्रव्य / तत्त्व / पदार्थ
जीव (आत्मा)………… द्रव्य। जीवत्व…………………..तत्त्व। जीव की पर्याय (मनुष्यादि)… पदार्थ। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
भगवान का घर
अपने घर को अपना न कहकर भगवान का कहने से घर में गलत काम नहीं हो पायेंगे। जैसे मन्दिर में नहीं कर पाते।
ज्ञान
ज्ञान तो बस ज्ञान है। माध्यम/ ग्रहण करने वाला सम्यक्/ मिथ्या हो सकता है। मुनि श्री मंगलसागर जी
मोह
मोह रूपी छोटा सा कागज़ भी आँख के करीब रखने से, वह पहाड़ जैसे बन जाता है। जिसके पीछे पूरा संसार ढक जाता है। सुख
रोना
अपने गुरु आचार्य श्री विद्यासागर जी की समाधि होने पर शिष्य रोये। मुनि को रोना चाहिये ? नहीं, लेकिन रोओ तो चन्दनबाला जैसा कि भगवान
ज्ञान
ज्ञान दो साधनों से –> 1. वस्तु(अजीव) जगत से… इसमें स्थायीपना होता है सो प्रमाणिक है जैसे आग जलाती है। आजकल इसका आदर बहुत बढ़
दोष
1. अतिक्रम –> मन की शुद्धि में कमी। 2. व्यतिक्रम –> मन से मर्यादा उलंघन। 3. अतिचार –> अज्ञान/ प्रमादवश विषय में प्रवृत्ति। 4. अनाचार
Feelings
गृहस्थों के लिए… One of the best feelings in the world is… knowing that someone is happy because of you. (J.L.Jain) साधुओं के लिए… One
द्वितियोपशम सम्यक्त्व
द्वितियोपशम सम्यक्त्व के साथ कौन से स्वर्ग में जाते हैं ? पहले से लेकर सर्वार्थसिद्धि तक, किसी में भी। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
मोह
मोह कम/ समाप्त कैसे होता है ? संसार/ सम्बन्धों को क्षणिक/Temporary मानने, उसका बार-बार चिंतवन करने से। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
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