Month: June 2026
सल्लेखना
पंचम काल में 12 वर्ष की सल्लेखना उचित नहीं। निमित्त ज्ञानी का अनुमान ग़लत भी हो सकता है* तब नियम तोड़ने से, अकाल मरण का
प्रतिक्रिया
2 मुर्गे लड़ते हैं प्रतिक्रिया के कारण। यदि प्रतिक्रिया न करें तो सामने वाले की स्थिति उस मुर्गे जैसी हो जाएगी जो दर्पण में चोंच
दर्शन-प्रतिमा
दर्शन-प्रतिमा में देवदर्शन से ज्यादा महत्वपूर्ण है शुद्ध/ सात्विक भोजन। देवदर्शन न मिलने पर एक स्थान पर बैठकर भगवान का चिंतवन करने से नियम पूरा
धर्म ध्यान
गुरुजन कहते हैं → धर्म ध्यान हर समय करते रहना चाहिए। पर हर समय पूजादि तो सम्भव नहीं ! पूजादि तो धर्म के बाह्य रूप
अखंड-पाठ
अखंड-पाठ घर पर नहीं करना चाहिए। क्योंकि घर में मंदिर जैसी शुद्धि/ संयम नहीं रखा जा सकता है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
दुःख
हम दुःख नहीं चाहते पर दुःख के साधनों को छोड़ना तो दूर, बढ़ाते/ जमा करते रहते हैं। मुनि श्री शैलसागर जी
शक्तितस तप
आदिनाथ भगवान 6 माह के उपवास का नियम लेकर ध्यान में बैठे। समय के साथ ध्यान की अवधि घटते-घटते, महावीर भगवान 2 दिन के बेले
विषयी
विष और विषयी शब्दों में साम्य है। विषयी के शरीर/ जीवन में विष धीरे-धीरे फैलता हुआ उसके परिवार/ समाज को भी विषाक्त कर देता है।
भाव
पहले भाव फिर मन। यदि यह क्रम न हो तो असंज्ञियों के भाव बनेगा ही नहीं। आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी
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