Month: June 2026
परीषह
परीषह आने पर हम अपने तथा धर्म के और ज़्यादा क़रीब हो जाते हैं: समता धारण करने पर संवर और निर्जरा होने लगते हैं। मुनि
इष्ट / अनिष्ट
इष्ट/अनिष्ट स्थायी नहीं रहते। माँ बचपन में इष्ट, शादी के बाद पत्नी फिर बच्चे, वृद्धावस्था में भगवान। मुनि श्री प्रमाणसागर जी
चारित्र मोहनीय
चारित्र मोहनीय का क्षयोपशम पुण्योदय/ पापोदय में समता भाव रखने से होता है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
आशीर्वाद
गुरु का पहला आशीर्वाद बीज-रूप होता है। आगे के जल-रूप, पौधे को स्वस्थ बनाये रखने के लिये। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
दस-धर्म
श्रावकों के लिये दस धर्म, शिक्षा के लिये। मुनियों की तरह एकाशन, मौन, कम से कम पाप। मुनि श्री निर्वेगसागर जी
तारीफ़
तारीफ़ नहीं, अपनी ओर देख, चक्कर नहीं। (जैसे झूले पर चक्कर तभी आते हैं जब बाहर की ओर देखते हैं) आचार्य श्री विद्यासागर जी
देशना / स्वाध्याय
मुनियों के प्रवचन… देशना लब्धि। वही विषय पण्डितों के मुख से… स्वाध्याय। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
पुण्य / पाप
प्राय: पुण्य के उदय में पाप करने का मन होता है और पाप के उदय में पुण्य का। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
कर्म फल
कर्म अपना फल द्रव्य, क्षेत्र, काल तथा भाव के अनुसार देते हैं। वर्तमान में पहले तीन हमारे नियंत्रण में नहीं, पर हम भावों को सुधार
अंतरंग यात्रा
गाड़ी जब रिवर्स में जाती है तब गति तो कम पर सावधानी ज़्यादा रखनी पड़ती है। ऐसे ही बाहर से अंदर की यात्रा करते समय
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