Month: June 2026
आत्मा की शुद्धता
आत्मा को त्रैकालिक शुद्ध नहीं कह सकते हैं। आत्मा की शक्त्ति त्रैकालिक शुद्ध है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
यंत्र/मंत्र/तंत्र
सृष्टि इन तीनों से ही चलती है। यंत्र, मंत्र हमको मजबूत करते हैं, जंगली पौधे जैसे मुसीबतें झेलता हुआ बढ़ता रहता है। तंत्र (साधन) कमज़ोर/पराधीन
जोड़ना/छोड़ना
चक्रवर्ती यदि सम्पदा छोड़े नहीं (दीक्षा लेकर) तो नरक जाता है। देवताओं पर तो अपार सम्पदा, छोड़ते नहीं, वे क्यों नहीं नरक जाते? जो जोड़ता
धर्म/संकट
धर्म वो नहीं जो संकटों को टाल दे, बल्कि वो जो संकटों में सम्हाल ले। देखा जाए तो धर्मात्माओं पर संकट आते तो है पर
धर्म / व्रत
धर्म आत्मा का स्वभाव जैसे क्षमा धर्म आदि। व्रत से आत्मा के स्वभाव में अवरोधक तत्त्वों को रोकना जैसे अपरिग्रह व्रतादि। व्रत साधन हैं, धर्म
समवसरण
भरत/ ऐरावत क्षेत्रों में समवसरण 12 योजन से लेकर 1 योजन तक के तथा विदेह क्षेत्रों में 12 योजन के ही होते हैं। निर्यापक मुनि
सीता
सीता जी पर अत्याचार नहीं, बल्कि ऊँचे स्थान पर बैठाने की प्रक्रिया थी जैसे साधुओं की कठिन साधना। तभी तो आम आदमी सीता राम कहता
धर्म
कहा है → “वस्तु का स्वभाव ही धर्म।” मेरा धर्म ? वस्तु के स्वभाव के अनुसार व्यवहार करना। चिंतन
धर्मात्मा
“वस्तु का स्वभाव ही धर्म है।” तुम धर्मात्मा बनना चाहते हो ? यदि हाँ, तो अपने स्वभाव में रहो। चिंतन
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