हंस दूध पीकर पानी को छोड़ता नहीं है, पानी छूट जाता है ।

शुध्द अवस्था में, शुभ अपने आप छुट जाता है, छोड़ना नहीं पड़ता ।

आ.श्री विद्या सा.जी

भगवान के दर्शन करते समय उनकी ओर पीठ नहीं होनी चाहिये
क्यों ?
1) भगवान का अपमान न हो
2) संसार को पीठ दिखाकर आने का प्रतीक है

जाते समय तो पीठ हो ही जाती है !!
यह भगवान से पीठ पर शाबासी/आशीर्वाद लेने का प्रतीक है।

गुरु मुनि श्री क्षमा सागर जी

चार मोमबत्तियां जल रही थीं पहली मोमबत्ती बोली, ” मैं शांति हूँ , पर मुझे लगता है अब इस दुनिया को मेरी ज़रुरत नहीं है , हर तरफ आपाधापी और लूट-मार मची हुई है, मैं यहाँ अब और नहीं रह सकती। …”
और ऐसा कहते हुए , कुछ देर में वो मोमबत्ती बुझ गयी।

दूसरी मोमबत्ती बोली , ” मैं विश्वास हूँ , और मुझे लगता है झूठ और फरेब के बीच मेरी भी यहाँ कोई ज़रुरत नहीं है , मैं भी यहाँ से जा रही हूँ …” ,
और दूसरी मोमबत्ती भी बुझ गयी।

तीसरी मोमबत्ती भी दुखी होते हुए बोली , ” मैं प्रेम हूँ, मेरे पास जलते रहने की ताकत है, पर आज हर कोई इतना व्यस्त है कि मेरे लिए किसी के पास वक्त ही नहीं , मैं ये सब और नहीं सह सकती मैं भी इस दुनिया से जा रही हूँ….”
और ऐसा कहते हुए तीसरी मोमबत्ती भी बुझ गयी।

वो अभी बुझी ही थी कि एक मासूम बच्चा उस कमरे में दाखिल हुआ। मोमबत्तियों को बुझे देख वह घबरा गया , उसकी आँखों से आंसू टपकने लगे और वह रुंआसा होते हुए बोला , “अरे , तुम मोमबत्तियां जल क्यों नहीं रहीं ?”

तभी चौथी मोमबत्ती बोली , ” प्यारे बच्चे घबराओ नहीं, मैं आशा हूँ और जब तक मैं जल रही हूँ हम बाकी मोमबत्तियों को फिर से जला सकते हैं।

“ यह सुन बच्चे की आँखें चमक उठीं, और उसने आशा के बल पे शांति, विश्वास, और प्रेम को फिर से प्रकाशित कर दिया।

जब चारों तरफ अन्धकार ही अन्धकार नज़र आये ,  तो भी उम्मीद मत छोड़िये , क्योंकि आशा में इतनी शक्ति है कि ये हर खोई हुई चीज आपको वापस दिला सकती है।

शुभ दिपावली


(डा.अमित)

बस दो मसले जिंदगी भर ना हल हुए….

प्यास लगी थी गज़ब की…
मगर पानी में ज़हर था…
पीते तो मर जाते और ना पीते तो मर जाते ।

ना नींद पूरी हुई, ना ख्वाब मुकम्मल हुए !

वक़्त ने कहा….काश थोड़ा और सब्र होता !
सब्र ने कहा….काश थोड़ा और वक़्त होता !

सुबह सुबह उठना पड़ता है, कमाने के लिए साहेब…।
आराम कमाने निकलता हूँ,
आराम छोड़कर।

“हुनर” सड़कों पर तमाशा करता है और “किस्मत” महलों में राज करती है !

शिकायतें तो बहुत हैं, तुझसे ऐ जिन्दगी !
पर चुप इसलिये हूँ कि,
जो दिया तूने,
वो भी बहुतों को नसीब नहीं होता…

(शुचि)

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