Category: अगला-कदम

सत्य

कषायों को मंद किये बिना किसी की भी स्थितिकरण तथा उपगूहन नहीं कर सकते। स्थितिकरण तथा उपगूहन किये बिना, सत्य खोजा नहीं जा सकता। मुनि

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ज्ञान

कहा जाता है कि अकेला एक ज्ञान “केवलज्ञान” होता है। लेकिन विशेष परिस्थितियों में मतिज्ञान भी अकेला रह सकता है जैसे शिवभूति मुनिराज को णमोकार

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नैगम नय

द्रव्य नैगम नय… अयोग्य राजकुमार को राजा कहना, राजा बन भी सकता है न भी बने। भावी नैगम नय… अरिहंत को सिद्ध कहना, नियम से

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उपयोग / लब्धि

उपयोग में एक समय में एक ही ज्ञान होता है। अन्य ज्ञान कर्मों के क्षयोपशम से लब्धि रूप रहते हैं। केवलज्ञान हमेशा उपयोग रूप ही

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समय

एक-समय, निश्चय काल की अपेक्षा –> द्रव्य, व्यवहार काल की अपेक्षा –> पर्याय। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जिज्ञासा समाधान)

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अयोग केवली / नोकर्माहार

अयोग केवली के नोकर्माहार नहीं रहता तो शरीर कैसे चलता है ? आचार्य श्री विद्यासागर जी – पाप त्याग के बाद भी अल्प रहे संसार।

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सर्वोत्तम

जब बुद्धि को विश्राम देते हैं तो सर्वोत्तम निकलता है क्योंकि आत्मज्ञान Takeover कर लेता है। चाहे संगीत हो या परमार्थ। भगवान जब श्रेणी माढ़ते

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अचल-प्रदेश

धर्म, अधर्म और आकाश के भी अचल-प्रदेश होते हैं। मुनि श्री सौम्य सागर जी (जीवकांड-576 – 28 जून)

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क्षयोपशम

कर्मों के एकदेश क्षय या उदयाभावी क्षय तथा एकदेश उपशम को क्षयोपशम कहते हैं। क्षुल्लक श्री जैनेंद्र वर्णी जी (कर्म सिद्धांत)

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अर्पिता नर्पित सिद्धे

अस्तित्व धर्म अस्ति को बताता है। नास्तित्व धर्म अन्य द्रव्यों से पृथक करता है पर रूपी नहीं होता है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र

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मंगल आशीष

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