Category: अगला-कदम
आत्मा का शरीर छोड़ना
गुरुजन बताते हैं –> किसी भी कर्म के निषेक झड़ना शुरू में अधिक, आगे-आगे कम-कम होते जाते हैं। इसीलिए कथंचित् आगे जाकर इतने कम हो
प्रथमोपशम
प्रथमोपशम सम्यग्दर्शन होते समय मिथ्यात्व के 3 टुकड़े सम्यग्दर्शन होने से पहले होते हैं या होने के बाद ? योगेंद्र युगपत। मुनि श्री सौम्य सागर
दूसरे गुणस्थान में मिथ्यात्व ?
हालांकि मिथ्यात्व पहले गुणस्थान तक ही रहता है परंतु दूसरे गुणस्थान में अनंतानुबंधी के सद्भाव में मिथ्यात्व न होते हुए भी मिथ्यात्व जैसा रहता है।
व्यंजन पर्याय
शुद्ध द्रव्यों में प्रदेशत्व की अपेक्षा व्यंजन पर्याय भी घटित हो सकती है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
सातिशय पुण्य
सातिशय पुण्य क्या है ? प्रिया सातिशय पुण्य मतलब जिसमें अतिशय हो (जैसे मुनी बनना)। यह पुण्यानुबंधीपुण्य के बहुत ऊपर की अवस्था है। मुनि श्री
प्रेम / रागादि
प्रेम जीव से, गुरु गुण देखकर। रागादि (द्वेष/ मोह) शरीर से होता है, क्षणिक। प्रेम की अधिकता होने पर द्रव्य-दृष्टि बनायें। द्वेष की अधिकता होने
चेतना
शुद्ध कर्मफल चेतना तो एकेन्द्रिय की ही होती है। त्रस जीवों में कर्मचेतना तथा कर्मफल चेतना दोनों होती हैं परंतु अशुद्ध रूप में। ज्ञानचेतना सिद्ध
गति/आयु बंध
आयुबंध की तुलना में गति-बंध का इतना महत्व नहीं क्योंकि आयु-बंध के साथ तथा बाद में भी वही गति-बंध होता रहता है जो आयु-बंध बंधी
अष्ट कुमारियाँ
षट्कुमारियों का वर्णन तो मिलता है कि वे कुलाचल पर्वतों पर रहती हैं, पर अष्ट-कुमारियाँ ? ये 13वें द्वीप में रुचिकरवर पर्वत पर रहती है
आयु जानना
आयु कितनी रह गयी, जानने के लिये 8 प्राणों (5 इंद्रियाँ, श्वासोच्छवास, कायबल, वचनबल) को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है। मुनि श्री मंगल सागर
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