Category: अगला-कदम
सर्वज्ञ
सर्वज्ञ सबको कैसे जान लेते हैं ? खुद को जानने से सबको जान लेते हैं। क्योंकि खुद को जानने से जीव के स्वरूप को जान
भेद-अभेद
भेद – मेरे शरीर में दर्द है। अभेद – मैं मर जाऊँगा (मिथ्यात्व)। जैसे बुंदेलखंड आदि में ‘स’, ‘श’, ‘ष’ बोलने में भेद नहीं करते
भोगभूमिज
भोगभूमजियों में पुरुष का मरण जम्हाई से होता है, स्त्रियों का छींक से। छींक में कम समय लगता है, जम्हाई में ज्यादा। इससे पुरुष की
सत्य
कषायों को मंद किये बिना किसी की भी स्थितिकरण तथा उपगूहन नहीं कर सकते। स्थितिकरण तथा उपगूहन किये बिना, सत्य खोजा नहीं जा सकता। मुनि
ज्ञान
कहा जाता है कि अकेला एक ज्ञान “केवलज्ञान” होता है। लेकिन विशेष परिस्थितियों में मतिज्ञान भी अकेला रह सकता है जैसे शिवभूति मुनिराज को णमोकार
नैगम नय
द्रव्य नैगम नय… अयोग्य राजकुमार को राजा कहना, राजा बन भी सकता है न भी बने। भावी नैगम नय… अरिहंत को सिद्ध कहना, नियम से
उपयोग / लब्धि
उपयोग में एक समय में एक ही ज्ञान होता है। अन्य ज्ञान कर्मों के क्षयोपशम से लब्धि रूप रहते हैं। केवलज्ञान हमेशा उपयोग रूप ही
समय
एक-समय, निश्चय काल की अपेक्षा –> द्रव्य, व्यवहार काल की अपेक्षा –> पर्याय। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जिज्ञासा समाधान)
अयोग केवली / नोकर्माहार
अयोग केवली के नोकर्माहार नहीं रहता तो शरीर कैसे चलता है ? आचार्य श्री विद्यासागर जी – पाप त्याग के बाद भी अल्प रहे संसार।
सर्वोत्तम
जब बुद्धि को विश्राम देते हैं तो सर्वोत्तम निकलता है क्योंकि आत्मज्ञान Takeover कर लेता है। चाहे संगीत हो या परमार्थ। भगवान जब श्रेणी माढ़ते
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