Category: अगला-कदम
समय
एक समय → निश्चय काल की अपेक्ष….. द्रव्य। व्यवहार काल की अपेक्षा… पर्याय। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जिज्ञासा समाधान)
जीव / अजीव
1. जीव तथा अजीव (अणु) दोनों ही एक समय में 14 राजू गति कर सकते हैं। 2. दोनों पूरे लोकाकाश को घेर सकते हैं। (पुद्गल
देशघाती / सर्वघाती
देशघाती में सर्वघाती द्रव्य भी रहता है, सर्वघाती में देशघाती नहीं जैसे अनंतानुबंधी। क्षयोपशम में देशघाती तथा सर्वघाती दोनों रहते हैं जैसे ज्ञानावरणादि में। कमलाबाई
भाव / उपयोग
पारिणामिक भाव चैतन्य भाव के हमेशा साथ (भव्यत्व या अभव्यत्व/ जीवत्व)। उपयोग अनेक तरह से परिवर्तित, भावात्मक परिणति भाव से उपयोग में परिवर्तन। उपयोग में
औदारिक
“औदारिक” उदार शब्द से बना है जैसे उपशम से औपशमिक। उदार यानी बड़ा/ स्थूल/ महान। उदार क्यों कहा ? 1. चारों पुरुषार्थों में सबसे कठिन/
शरीरों की सूक्ष्मता
औदारिक से कार्मण तक सूक्ष्मता अधिक-अधिक होती जाती है। सूक्ष्मता दो दृष्टि से – 1.स्थूलता में कमी 2.दृष्टिगोचर न होना वैक्रियक शरीर देव दिखाना चाहें
लब्धि
1. पाँच लब्धियाँ.. सम्यग्दर्शन होने से पहले (5 Achievements) 2. क्षायिक लब्धि.. कर्म क्षय होने पर आत्मा को गुण प्राप्ति। 3. क्षयोपशम लब्धि.. कर्म के
क्षयोपशम सम्यग्दर्शन
जब क्षयोपशम सम्यग्दर्शन, सम्यक् प्रकृति के उदय से होता है तो इसके भाव को औदयिक-भाव क्यों नहीं कहा ? सम्यक् प्रकृति का उदय मुख्य कार्य/
कर्म / नोकर्म
नोकर्म शरीरादि। “नो” = ईषत्/ अल्प/ नहीं भी/ विपरीत (कर्म से क्योंकि कर्म तो आत्मा का घात करते हैं, नोकर्म नहीं या ईषत सुख/दु:ख देते
संवेग
संवेग संसार से भयभीत होना। संवेग धर्म को ग्रहण करने की पात्रता देता है। संवेग के अभाव में पाप भी उतनी ही Intensity से किये
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