Category: अगला-कदम
सिद्धों के गुण
सूक्ष्मत्व नामकर्म के अभाव से। अवगाहनत्व आयु कर्म के अभाव से। अव्याबाध… सुख नहीं गुण प्राप्त हुआ, गोत्र कर्म या वेदनीय कर्म के अभाव से।
सुख / दु:ख
सुख/दु:ख, मोहनीय/वेदनीय से। शरीर से मोह तो शरीरगत व्याधियों से दु:ख/ ठीक होने पर सुख। शरीर को सुन्न करने से शरीर की बाधाएँ/ दु:ख का
गुणस्थानों में बंध
दूसरे गुणस्थान में मिथ्यात्व तो है नहीं, बंध कारण अनंतानुबंधी जनित अविरति है। क्योंकि मिथ्यात्व के बाद बंध का दूसरा प्रत्यय अविरति ही है। चौथे
सम्यक् प्रकृति
मिथ्यात्व का रस अनंतगुणा हीन तब सम्यक् मिथ्यात्व। सम्यक् मिथ्यात्व का रस अनंतगुणा हीन तब सम्यक् प्रकृति। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 8/9)
गुप्ति
वचन गुप्ति – प्रवृत्यात्मक… भाषा को हित, मित, प्रिय (समिति-पूर्वक बोलना) निवृत्यात्मक… मौन (न झूठ, न सच)। मनोगुप्ति… आर्तध्यान में नहीं लगना। मुनि श्री प्रणम्यसागर
संवर मार्ग
आचार्य श्री विद्यासागर जी ने संवर मार्ग छठे गुणस्थान से माना है क्योंकि सही में संवर तो गुप्ति, समिति से होता है, हालाँकि संवर की
कर्म वर्गणा
कर्म वर्गणाएँ एक रूप होती हैं। बंधने के बाद चार रूप… प्रकृति बंध…स्वभाव/ किस कर्म को बाधित करेगी जैसे बारिश जल सर्प मुख में विष
दर्शन
दर्शन… व्यावहारिक देखना नहीं। ज्ञान से पहले का सामान्य अवलोकन जिसमें न विशेषता ग्रहण, न पदार्थ की जाति, न क्रिया, ना ही गुण ग्रहण होते
जीव
जीव उपयोग लक्षण वाला, अंत रहित (अनादि-अनंत), अपने कर्म का करने वाला अर्थात् कर्ता और भोगने वाला है। समणसुत्तं – गाथा 592
तीसरे गुणस्थान में आयुबंध ?
तीसरे गुणस्थान में आयुबंध क्यों नहीं ? तीसरे गुणस्थान में ना तो मिथ्यात्व की, ना ही सम्यक्त्त्व की तीव्रता इतनी होती है कि वह आयुबंध
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