Category: अगला-कदम
धर्म / व्रत
धर्म आत्मा का स्वभाव जैसे क्षमा धर्म आदि। व्रत से आत्मा के स्वभाव में अवरोधक तत्त्वों को रोकना जैसे अपरिग्रह व्रतादि। व्रत साधन हैं, धर्म
भाव
पहले भाव फिर मन। यदि यह क्रम न हो तो असंज्ञियों के भाव बनेगा ही नहीं। आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी
छद्मस्थ
छद्मस्थ… जिनकी आत्मा में आवरण स्थित है। सूत्र (9/10) में दसवें गुणस्थान के बाद आया है सो ज्ञान/दर्शनावरण ही लेना। सैद्धांतिक दृष्टि से 1-10 गुणस्थान
जीव विपाकी
जीव विपाकी… सूक्ष्म/ बादर –> जीव की परिणति है। आदेय –> यशस्वी, कीर्तिवान, लोकमान्य। तीर्थंकर प्रकृति –> महसूस करते हैं, अहंकार नहीं करते। मुनि श्री
नय
संसार दोनों नयों से चलता है। नित्य/अनित्य, व्यवहार (भेदरूप)/निश्चय (अभेदरूप)। काना (एक आँख वाला) अपशकुन माना जाता है, मिथ्यादृष्टि। आर्यिका श्री पूर्णमति माताजी
अनुभाग-बंध
“विपाकोनुभव:” तत्त्वार्थ सूत्र – अध्याय 8/21 अनुभाग तथा अनुभव एकार्थक; तथा भिन्नार्थक भी… अनुभाग…कर्मबंध के समय की शक्ति। अनुभव…कर्मफल के समय की शक्ति। मुनि श्री
ज्ञान
कोरे काग़ज़ पर सही पता….सम्यग्ज्ञान, कोरे काग़ज़ पर ग़लत पता…मिथ्याज्ञान। चिंतन
निकाचित
निधत्ति निकाचित कर्म देवदर्शन से समाप्त। दूसरे मतानुसार आठवें गुणस्थान में। दोनों मतों में सामंजस्य ? चौथे से आठवें गुणस्थान में… प्रथमानुयोग/ चरणानुयोग से चौथे
सिद्ध
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी… एक बार सिद्ध बनने पर वापस कभी नहीं आ सकते हैं। जैसे घी कभी दूध नहीं बन सकता। मुनि श्री
उदयाभावी क्षय
उदयाभावी क्षय…. अनंतानुबंधी का तीन परमुख (अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान, संज्ज्वलन) उदय होना। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी जैसे सर्दी में ओवरकोट पहनें हों। उसकी जगह स्वेटर
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