Category: अगला-कदम
सिद्ध
गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी… एक बार सिद्ध बनने पर वापस कभी नहीं आ सकते हैं। जैसे घी कभी दूध नहीं बन सकता। मुनि श्री
उदयाभावी क्षय
उदयाभावी क्षय…. अनंतानुबंधी का तीन परमुख (अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान, संज्ज्वलन) उदय होना। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी जैसे सर्दी में ओवरकोट पहनें हों। उसकी जगह स्वेटर
भाव
भाव…. घर में मेहमान आये, बच्चे उपद्रवी –> औदयिक भाव। रात को बच्चों की कुटाई, घर में शांति –> औपशमिक भाव। दुबारा मेहमान आये, बड़े
मूर्तिक / अमूर्तिक
पुद्गल ही मूर्तिक है, बाकी सब द्रव्य अमूर्तिक हैं। संसारी जीव कर्म-वर्गणाओं (पौद्गलिक) सहित सो मूर्तिक, कर्म-रहित (सिद्ध) अमूर्तिक।
अभिषेक
अभिषेक पांडुकशिला पर “श्री” लिखकर करना चाहिये। ताकि भगवान पर ढाया हुआ जल “श्री” को छूता हुआ आये। क्योंकि अभिषेक श्रावकों के द्वारा श्रावकों के
रूपी / मूर्तिक
1. आत्मा –> रुपी संसारी की, रुपी/ अरुपी केवलज्ञानी का विषय। अमूर्तिक(निश्चित आकार नहीं)। सिद्ध –> अरुपी, अमूर्तिक … केवलज्ञानी का विषय। 2. विषयभोग –>
अचित्त
अचित्त सेवन से वातादि दोष नहीं होते हैं। जोड़ों के दर्द में लाभ, खासतौर पर शीतकाल में। अपच भी नहीं। शरीर में हल्कापन। सचित्त में
बंध के हेतु
बंध के हेतु…. सिद्धान्त ग्रंथों के 3 हेतु…राग, द्वेष, मोह। अन्य ग्रन्थों में 4 हेतु……. मिथ्यात्व, अविरति, कषाय, योग। तत्त्वार्थ सूत्र में 5 हेतु……. मिथ्यात्व,
द्रव्य / तत्त्व / पदार्थ
जीव (आत्मा)………… द्रव्य। जीवत्व…………………..तत्त्व। जीव की पर्याय (मनुष्यादि)… पदार्थ। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
श्रावक / आत्मानुभव
जब तक बाह्य दृष्टि रहेगी, अंतरंग पर दृष्टि/ आत्मानुभूति कैसे हो सकती है? श्रावक बाह्य से दृष्टि हटा नहीं सकता। चिंतन</span
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