Category: अगला-कदम

नामकर्म प्रकृतियाँ

93 नामकर्म प्रकृतियों में से 13 अरहंत भगवान की 63 प्रकृतियों के क्षय के साथ समाप्त हो जाती हैं, बाकी 14 गुणस्थान में, ऐसा क्यों

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आहार

आहार पर्याप्ति कारण है, आहार संज्ञा कार्य। चिंतन

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अंतराय / गोत्र

अंतराय, गोत्रकर्म में विघ्न कैसे डालता है ? उच्चगोत्र वालों से नीचगोत्र जैसे कर्म करवा कर। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – अध्याय 8)

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उदयाभावी क्षय

क्षय कैसे ? गंदगी का ऊपर न आने देना, उदयाभावी क्षय। उपशम कैसे ? सदवस्था रुप उपशम, गंदगी नीचे ही बैठी है। मुनि श्री मंगलसागर

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सम्यग्दर्शन

क्या सम्यग्दर्शन के बिना भी धर्म हो सकता है ? किसी लिफ़ाफ़े पर पता लिखा ही न हो, तो क्या वह गंतव्य पर पहुँचेगा ?

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पुण्य

पुण्य का उपयोग -> पुण्यानुबंधी पुण्य, पुण्य का उपभोग -> पापानुबंधी पुण्य।

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द्रव्य का महत्त्व

समवसरण में पहले गुणस्थान वाले मुनि भी 13वें गुणस्थान वाले केवलियों के साथ एक कोठे में बैठते हैं। जबकि पाँचवें गुणस्थान तक वाले श्रावक अलग

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औदयिक भाव

तीर्थंकर-प्रकृति को छोड़कर, औदयिक भाव बंध के कारण होते हैं । निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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9 लब्धि

भोग और उपभोग लब्धियाँ तीर्थंकरों को ही होती हैं। सामान्य केवलियों के भी पूरी 9 लब्धि होती हैं, पर अंतरंग। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ

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मंगल आशीष

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