Category: अगला-कदम
द्रव्य / पदार्थ / तत्त्व
द्रव्य जब किसी पद पर स्थापित हो जाता है तो पदार्थ कहलाने लगता है। उसका जो सार होता है, वह तत्त्व हो जाता है। निर्यापक
अगुरुलघु
यह सब गुणों को शक्ति देता है जैसे खजांची। अगुरुलघु सब द्रव्यों (पुद्गल में भी) में पाया जाता है। सिद्ध पर्याय को नीचे नहीं गिरने
साता/असाता
शुद्ध निश्चय नय से कर्म, कर्म में है, “मैं अपने में” ऐसा ज्ञानी सोचता है। तब उसे सुख-दु:ख में हर्ष-विषाद नहीं होता है। इस प्रकार
सर्वज्ञ
सर्वज्ञ सबको कैसे जान लेते हैं ? खुद को जानने से सबको जान लेते हैं। क्योंकि खुद को जानने से जीव के स्वरूप को जान
भेद-अभेद
भेद – मेरे शरीर में दर्द है। अभेद – मैं मर जाऊँगा (मिथ्यात्व)। जैसे बुंदेलखंड आदि में ‘स’, ‘श’, ‘ष’ बोलने में भेद नहीं करते
भोगभूमिज
भोगभूमजियों में पुरुष का मरण जम्हाई से होता है, स्त्रियों का छींक से। छींक में कम समय लगता है, जम्हाई में ज्यादा। इससे पुरुष की
सत्य
कषायों को मंद किये बिना किसी की भी स्थितिकरण तथा उपगूहन नहीं कर सकते। स्थितिकरण तथा उपगूहन किये बिना, सत्य खोजा नहीं जा सकता। मुनि
ज्ञान
कहा जाता है कि अकेला एक ज्ञान “केवलज्ञान” होता है। लेकिन विशेष परिस्थितियों में मतिज्ञान भी अकेला रह सकता है जैसे शिवभूति मुनिराज को णमोकार
नैगम नय
द्रव्य नैगम नय… अयोग्य राजकुमार को राजा कहना, राजा बन भी सकता है न भी बने। भावी नैगम नय… अरिहंत को सिद्ध कहना, नियम से
उपयोग / लब्धि
उपयोग में एक समय में एक ही ज्ञान होता है। अन्य ज्ञान कर्मों के क्षयोपशम से लब्धि रूप रहते हैं। केवलज्ञान हमेशा उपयोग रूप ही
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