Category: वचनामृत – अन्य

साँस

साँस ही जीवन है। जितनी अधिक साँस व्यय करेंगे उतना जीवन नष्ट होगा। यदि प्राणायाम नहीं कर सकते तो लम्बी-लम्बी गहरी साँस लें। निर्यापक मुनि

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सत्य

सत्य प्रकट करने की अगर ज़िद ही है तो अपना सत्य प्रकट करें, तुम्हारा तुरंत लाभ, देखने वाले प्रभावित होंगे और वे भी प्रेरित होंगे

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उपलब्धि / संतोष

उपलब्धि थोड़े समय का संतोष है, संतोष हमेशा की उपलब्धि। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

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भगवान से संबंध

यदि भगवान से एकत्व स्थापित कर लिया तो वे कभी विभक्त नहीं होने देंगे। निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

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चोरी का माल

चोर घोड़ा चुरा कर बेचने खड़ा हुआ। कीमत तो मालूम नहीं थी सो बहुत ज्यादा बता रहा था। ग्राहक लौट रहे थे। एक ने कहा

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सीख

खाओ-पीओ, चखो मत*। देखो-भालो, तको मत। हँसो-बोलो, बको मत। खेलो-कूदो, थको मत। मुनि श्री मंगलसागर जी * बार-बार खाना।

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निस्पृहता

आचार्य श्री विद्यासागर जी को बताया –> आप सुबह 3-4 बजे से लेकर रात तक इतनी मेहनत करते हैं, एक गिलास दूध ले लिया करिए,

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धार्मिक क्रियायें

टीवी आदि के निमित्त से धर्म खूब हो रहा है, तो धर्म का ह्रास कैसे और क्यों कहा ? जितनी धार्मिक क्रियायें हो रही हैं,

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चाहत

हम धनादि/ पुत्रादि से ज्यादा अपने को चाहते हैं। जैसे दर्पण को नहीं, उसमें अपने को देखते हैं, दर्पण को तो निमित्त बना लेते हैं।

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मोह

मोह प्राय: निकृष्ट/ लुटेरों/ खचोरों से ही होता है। क्षु. सहजानंद जी (सज्जन लूटेगा/ खचोरेगा नहीं)।

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मंगल आशीष

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