Category: वचनामृत – अन्य

निराकुलता

अतिभाव तथा अतिअभाव दोनों ही आकुलता देते हैं।* समभाव से ही निराकुलता आती है। मुनि श्री प्रमाणसागर जी *(अति-निर्देश भी)।

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अहंकार

अहंकार… राजा भोज के दरबार में एक ज्ञानी ने कोरे कागज़ पर बिना कुछ लिखे बताया कि इस कागज़ पर एक सुंदर कविता लिखी है।

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बहुलता

पौधे कम खाद देने पर कम मरते हैं, ज्यादा खाद देने पर ज्यादा। शरीर/ संसार के लिये Excess ज्यादा हानिकारक है। मुनि श्री मंगलानन्द सागर

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धर्म / अधर्म

अपराध करना अधर्म। उसका फल सहजता/ स्वीकृति के साथ सहना, धर्म। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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साधु

साधु का घर दूर है जैसे पेड़ खजूर, चढ़े तो मीठे फल चखे, गिरे तो चकनाचूर। मुनि श्री अजितसागर जी

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व्यक्तित्व

वर्तमान के क्रियाकलाप मेरे व्यक्तित्व का सही से निर्धारण नहीं कर सकते। मैं क्या नहीं कर पा रहा हूँ, वह सही निर्धारण करेगा। निर्यापक मुनि

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व्यक्ति / गुण

व्यक्तियों से जुड़ोगे तो मोह। गुणों से जुड़ोगे तो धर्म। मुनि श्री प्रमाणसागर जी

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धर्म

प्राय: धर्म में आस्था तो होती है, निष्ठा (स्थिरता) नहीं, इसलिए धर्म टिकता नहीं। मुनि श्री मंगलानन्द सागर जी

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दानादि

दानादि… देव, शास्त्र, गुरु को। सहयोग……… किसी को भी। भेंट……… अपने से बड़ों को। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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शक्ति

सबसे बड़ी शक्तियाँ हैं… इच्छा तथा संकल्प शक्तियाँ। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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मंगल आशीष

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