Category: वचनामृत – अन्य
विशालता
विशालता जिसकी कोई सीमा ना हो जैसे आकाश/ विचार/ भगवान का सुख, ज्ञान। एक रूप/ न वृद्धि/ न ह्रास। संसारी सुख कम-ज्यादा इसलिए विशाल नहीं।
जियो और जीने दो
साधु का “जियो” कमज़ोर*, गृहस्थ का “जीने दो”। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी * अपने शरीर पर ध्यान कम, आत्मा/ धर्म/ समाज पर अधिक।
अनन्त
अनन्त संख्या को कैसे समझें ? अनन्त वह जिसमें आय न हो, सिर्फ़ व्यय ही व्यय हो पर संख्या अनन्त रहे, जैसे भविष्य आज अनन्त
सुख
संसारी सुख… हर सुख के पीछे दु:ख जैसे भोजन बनाने में दु:ख, उसे सुख की आशा कि परिवारजन खुश होंगे। दु:ख का प्रतिकार ही
नॉनवेज क्यों नहीं ?
नॉनवेज में हिंसा का कारण बताने पर कुतर्क दिए जायेंगे। समझायें कि यह गंदा होता है क्योंकि इसमें खून, मांस, हड्डी आदि होते हैं। जबकि
आधुनिक उपकरण
क्या भगवान के ज्ञान में आधुनिक उपकरण मोबाइल आदि नहीं था? यदि था तो उन्होंने ऐसे सुविधाजनक उपकरणों के बारे में बताया क्यों नहीं? पिता
परिग्रह
पाँचों पाप रोग-रूप हैं। हिंसा, झूठ, चोरी और कुशील के तो लक्षण दिखते हैं और उनका इलाज सम्भव है, पर परिग्रह के लक्षण अंतरंग हैं।
अंगदान
अंगदान… करुणा, अभय, औषधि (निरोग करना) दान में आयेगा। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जिज्ञासा समाधान – 5-4-22)
विकास
संसार तथा परमार्थ में विकास के लिये … एक आदर्श होना चाहिये जैसे भगवान। आदर्श को समझने के लिये गुरु का अवलम्बन ज़रूरी है। उनके
छोटों को महत्व
छोटों को महत्व… इकाई से ही दहाई आदि बड़ी-बड़ी संख्यायें बनतीं हैं। इकाई को महत्व नहीं देंगे तो दहाई बनेगी कैसे ! मुनि श्री सुप्रभसागर
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