Category: वचनामृत – अन्य
हार का कारण
दुर्योधन के पास बड़ी सेना, दोनों गुरु, बड़े-बड़े गुरुजन, फिर भी हारा। कारण ? गुरुजनों से चाहता था। पांडव गुरुजनों को चाहते थे। निर्यापक मुनि
भगवान बनना
भगवान बनने के लिए (श्री रयणसार के अनुसार) – पहले भक्त बनो। किसके ? देव-शास्त्र-गुरु के, देव/ गुरु प्रपंच रहित, शास्त्र विवाद/ विरोध रहित हैं।
ईर्ष्या
ईर्ष्या की ख़ासियत – जिनसे करोगे उसकी प्रगति होगी (सामने वाला Competition में और मेहनत करता है)। प्रेम किया तो वह अकर्मण्य हो जायेगा (जैसे
सीख
धूप में छाँव का अनुभव करते हो या छाँव में धूप का डर रहता है ! डरेगा वह नहीं जिसके जीवन में भगवान/ गुरु की
वात्सल्य
अपनी समर्थता से सधर्मी की असमर्थता को समर्थता में बदलना । निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी
निंदा / पूजा
निंदा के साथ पूजा करना, स्वनिंदा बिना पूजा से कम महत्वपूर्ण है। स्वनिंदा से कर्मों का नाश होता है। कहा जाता है –> परनिंदा करने
दान
पहले तात्कालिक लाभ को प्राथमिकता पर दीर्घकालीन ज्यादा महत्वपूर्ण। मंदिर आदि में (बोलियाँ आदि लेना) चार प्रकार के दानों के अलावा, धर्म प्रभावना के लिए
धर्म
धर्म जीने की कला सिखाता है, साथ साथ मरने का सलीका भी। जैसे एक ही थाली से खाया भी जाता है, त्याग भी। आर्यिका अर्हम्
धैर्य / आलस
धैर्य, क्षमतानुसार पुरुषार्थ करके बिना विकल्प के फल का इंतज़ार करना। क्षमतानुसार पुरुषार्थ न करके फल का इंतज़ार करना, आलस होता है। मुनि श्री प्रमाणसागर
स्वाभिमान / अभिमान
स्वाभिमान के साथ जब अकड़ आ जाती है तब वह अभिमान का रूप ले लेता है। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (जिज्ञासा समाधान – 4.4.22)
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