Category: वचनामृत – अन्य

साधु / स्वादु

साधु को स्वादु होना चाहिए। जैसा भी मिले स्वाद लेकर खाना चाहिए। मुनि श्री मंगलानंद सागर जी

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Thinking

शेर की +ve Thinking थी कि उस पर कोई मुसीबत नहीं आ सकती। लेकिन उसके पास Power Thinking नहीं थी, मुसीबत किसी पर भी आ

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ज्ञानी / अज्ञानी

ज्ञानी अपराध होने पर सज़ा चाहता है/ मांगता है, मिलने पर खुश। अज्ञानी सज़ा मिलने पर जेल तोड़कर भागना चाहता है। जिन पर मुसीबत ज्यादा

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भगवान कहाँ ?

वैदिक दर्शन में –> कण-कण में। जैन दर्शन में –> घट-घट में भगवान बनने की क्षमता। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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कषाय

चार कषायों में से पहली दो क्रोध और मान प्रत्यक्ष देखने में आती हैं, तीसरी मायाचारी कभी-कभी और चौथा लोभ तो समझ ही नहीं सकते/

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यंत्र / मंत्र / तंत्र

यंत्र – Material का सहारा जैसे लाउड स्पीकर। मंत्र – अदृश्य शक्ति का सहारा लेकर कार्य सम्पादन। तंत्र – भावात्मक शक्ति का सहारा लेकर कार्य

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दान

दान को खर्चे में कभी मत डालना। खर्चा होने पर लौटकर नहीं आता जबकि दान ब्याज सहित लौटकर आता है/ बीज रूप है। निर्यापक मुनि

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संवाद / विसंवाद

संवाद → संवाद से शंकायें दूर होती हैं, सामंजस्य बैठता है। विसंवाद → 1. सत्य जानते हुए भी सामने वाले के तथ्यों को काटना। 2.

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सुख

सुख की तासीर है सुप्तता। सो सुख में सावधानी अत्यंत आवश्यक है। निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी

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मृत्यु

जब मृत्यु निश्चित है तो डर क्यों? अपने कर्मों तथा कर्म-सिद्धांत पर विश्वास की कमी। ध्यान/ Meditation के अभ्यास की कमी (जो ध्यान में मृत्यु

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मंगल आशीष

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