Category: अगला-कदम

विचय

अपाय/ उपाय विचय चौथे गुणस्थान में नहीं होता। जो खुद दुखों से बचने का उपाय नहीं कर रहा, वह दूसरों को बचाने का क्या/ क्यों

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कार्मण शरीर

कार्मण शरीर की उत्कृष्ट स्थिति (एक कर्म की अपेक्षा) 70 कोड़ाकोड़ी सागर होती है। सब कर्मों की अपेक्षा अनादि-अनंत या सांत। मुनि श्री सौम्य सागर

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क्षायिक लाभ

अनंत गुणों का अनंत काल के लिये लाभ को क्षायिक लाभ कहते हैं। मुनि श्री प्रणम्यसागर जी (तत्त्वार्थ सूत्र – 2/5)

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प्रभाव

द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव का आपस में प्रभाव 16 प्रकार से होता है। आर्यिका अर्हमश्री माताजी

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कुभोगभूमि

कुभोगभूमि और भोगभूमि में शरीर के अंतर के अलावा कल्पवृक्ष होने व न होने का भी फ़र्क होता है। इससे भोजन के अलावा आभूषणादि भोगभूमि

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सम्यग्दर्शन

सम्यग्दर्शन तत्त्वार्थ पर सही(समीचीन) श्रद्धान। सम्यक् – सही कार्य/ लक्ष्य। तत्त्वार्थ – अधिकरण। श्रद्धान – प्रतीति/ लक्षण। प्रतीति – ऐसा ही है। मुनि श्री प्रणम्यसागर

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सूक्ष्म / साधारण

आचार्य श्री विद्यासागर जी कहते थे… सूक्ष्म और बादर, जीव के विशेषण हैं, प्रत्येक और साधारण, शरीर के। मुनि श्री सौम्य सागर जी (श्री जीवकांड

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सप्रतिष्ठित / अप्रतिष्ठित

आचार्य श्री विद्यासागर जी उदाहरण देकर बताते थे… आम का छिलका अप्रतिष्ठित, गूदा सप्रतिष्ठित, गुठली अप्रतिष्ठित, मींग सप्रतिष्ठित। मुनि श्री सौम्य सागर जी (श्री जीवकांड

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सप्त धातु

वैक्रियिक शरीर में सप्तधातु नहीं होती है। पर नारकियों के शरीर में अशुभतर होती है, क्योंकि उनको शारीरिक रोग/ कष्ट होते हैं, पहले से सातवें

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भवनत्रिक में लेश्या

मान्यता है कि भवनत्रिक में पीत तथा तीन अशुभ लेश्या होती हैं और अशुभ लेश्या अपर्याप्तक अवस्था में ही होती हैं। तत्तवार्थसूत्र में ऐसा कोई

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मंगल आशीष

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