संसार का दूसरा नाम ही समस्या है,
पर समाधान प्रभु का दूसरा नाम।

पहले स्कूल में दाखिला उन बच्चों को मिलता था जो एक हाथ से दूसरी ओर का कान पकड़ लें।
मुनिराज भी प्रतिदिन 3 बार अपने कान पकड़ते हैं प्रतिक्रमण के रूप में।

मुनि श्री मंगलानंद जी

हींग की डिब्बी से गंध कैसे दूर हो ?

1. केसर को ज्यादा-ज्यादा मात्रा में बार-बार भरने से।
बार-बार शुभ क्रियाओं से, अशुभ संस्कार खत्म हो जाते हैं।

2. डिब्बी को तपाने से।
तप से भी अशुभ संस्कार समाप्त हो जाते हैं।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

प्रायोगिक धर्म यानि आंतरिक/ व्यवहारिक धर्म जिसका प्रयोग घर तथा कारोबार में हो।
इसके अभाव में मन्दिर में रामायण तथा घर/ कारोबार में महाभारत!
इसीलिये आचार्य श्री विद्यासागर जी ने मूकमाटी महाकाव्य की रचना की है।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

हालाँकि अंधकार बहुत विशाल है, दीपशिखा छोटी सी, पर मेरा विश्वास दीपशिखा पर विशाल है।
(मेरे आसपास वह अंधकार को भटकने भी नहीं देगी)

श्री रविन्द्रनाथ टैगोर

कर्म सब काम कर रहे हैं,
आत्मा तो जानती है,
आत्मा करवाती है,
कर्म करता है, क्योंकि शक्तियाँ (योग, मन, भाव) आत्मा में ही हैं।

मुनि श्री प्रणम्यसागर जी

एक बार खोदने से हीरा नहीं मिलता, बार बार खोदने से मिलता है।
ग्रंथ भी बार बार पढ़ने से तत्त्व समझ आता है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

अच्छे की संगति से और अच्छे बन सकते हैं, वैसे ही बुरे की संगति बुराईयों को और बढ़ा देती है।
जैसे हीरा हीरे को तराश कर चमका देता है, पर कीचड़ कीचड़ को और गंदा कर देती है।

जीवन की शुरुवात दर्शन से ही होती है।
प्रकार…
1. बाह्य…. जो चर्म इन्द्रियों से होता है।
2. अंतरंग… सम्यग्दर्शन*, जिसके लिये गुरु की आवश्यकता होती है।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

* पदार्थों के सच्चे स्वरूप का दर्शन

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