चलो अपन जहाँ को बांट लेते हैं…
अकाश तुम रख लो, जमीं हम रख लेते हैं,
सूरज तुम रख लो, रोशनी हम रख लेते हैं।
चलो एक काम करते हैं…
सब कुछ तुम रख लो, तुम्हें हम रख लेते हैं।

(सलिल)

छोटी सोच शंका को जन्म देती है, बड़ी सोच समाधान को।
सुनना (गुरु की सीख/ कटु सीख) सीख लिया तो सहना सीख जाओगे और सहना सीख लिया तो रहना।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

साइकिल रेस में Cow Trap लगा दिया। ज्यादातर लोग पट्टियों पर से सावधानी पूर्वक धीरे-धीरे पार करके आगे बढ़े।
एक सवार Diagonally तेजी से Cross करके रेस जीत गया।

(कुरुप जी)

“संसार” में – छोटे “स” से बड़ा “सा” बन जाता है यानि संसार बढ़ता ही जाता है।
संयम यानि सं+यम – “स” से संयम/ सावधानी, वो भी “यम” यानि जीवन पर्यंत की। इससे संसार घटता ही जाता है।

चिंतन

अगर कोई मक्खी सब्जी तौलते समय तराजू पर बैठ जाए तो उसकी कीमत दस पैसे,
लेकिन वही मक्खी अगर सोना तौलती तराजू पर बैठ जाए तो उसकी कीमत दस हजार रुपये होगी।

हम कहाँ बैठते हैं ?
किसके साथ बैठते हैं ?
उसके मूल्य (भौतिक/ सांसारिक/ आध्यात्मिक) से हमारे मूल्य निर्धारण में भी फ़र्क पड़ता है।

(सुरेश)

भारत को विकासशील तथा पश्चात देशों को विकासवान कहा जाता है।
इसमें बुरा क्या ?
हमारा तो इतिहास कहता है कि हम हजारों वर्ष पहले भी विकासशील थे !

आचार्य श्री विद्यासागर जी

वाचना का अर्थ है प्रदान करना/ शिष्यों को पढ़ाना।
Self Study नहीं, इससे ही एकांत-मत पनप रहे हैं।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

1. एक विषय में निरंतर ज्ञान का रहना ध्यान है।
2. मन को विषयों से हटाने का पुरुषार्थ ध्यान है।
3. ध्यान लगाने का नाम नहीं, मोड़ने का नाम है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

जीवन का लक्ष्य मनोरंजन नहीं, रमण है;
बाह्य रमण (विषय-भोगों में) अधोगमन कराता है,पर गिरना ध्येय कैसे हो सकता है!
अंतरंग/ आत्मा में रमण उर्ध्वगमन कराता है।

निर्यापक निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

भगवान की वाणी को भोजन की तरह पूरा खोलकर, हर किसी के सामने परोसते नहीं रहना चाहिये वरना उसका महत्त्व कम हो जाता है।
उपदेश प्रज्ञावान को ही देना चाहिये, अक्षरज्ञानी को नहीं, श्रद्धावान को। भील भी श्रद्धापूर्वक छोटे-छोटे नियम अंत तक निभाकर प्रज्ञावान प्रसिद्ध हो गये।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

धर्म दो प्रकार का –
1. श्रावकों का…. अनुष्ठान की प्रमुखता,
2. श्रमणों (साधुओं) का…. अध्यात्म की प्रमुखता।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

(क्योंकि श्रावकों का मन बहुत भटकता रहता है। पूजा में 8 अर्घों के समय कम से कम 8 बार तो पूजा में मन लगेगा…. गुरुवर मुनि श्री क्षमासागर जी)

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