जब किसी में भी कुछ अच्छा दिखाई नहीं देता हो…!
तब समझ लेना कि…
स्वयं में बुरा ढूँढने का समय आ गया है…!!

मुनि श्री अविचल सागर जी

भारत को जब सोने की चिड़िया कहा जाता तब ग्रीस से कुछ लोग कारण समझने आये।
पता लगा – भारत का राजा अच्छा है।
राजा चन्द्रगुप्त से मिले, उन्होंने अपने गुरु चाणक्य को श्रेय दिया।
गुरु से पूछा, उन्होंने धर्म को।
तो आप क्या करते हैं ?
मैं राजा को धर्म बताता/ दिशा निर्देश देता हूँ।
हम भी अपने जीवन को सोने जैसा बनाना चाहते हैं तो गुरु से धार्मिक दिशा निर्देश लेते रहें।

राधाकृष्ण पिल्लई

सागर से कहा — देखो ! ये सूरज कितना दुष्ट है, तुमको जलाकर तुम्हारा पानी हड़प लेता है।
सागर — नहीं वह मुझ पर और सब पर परोपकार करता है।
खारे पानी को मीठा बनाकर मुझे वापस कर देता है, जहाँ मैं नहीं पहुँच सकता वहाँ की भी ज़रूरतें पूरी करता है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

बादलों से चट्टानों ने शिकायत की… चारों ओर तुम हरियाली कर देते हो, मुझ पर एक घास का तिनका भी नहीं उगाते !
बादल… इसमें ग़लती तुम्हारे अकड़पने की है। पहली बरसात में ही भूमि नरम हो जाती है पर तुम पूरी बरसात में अपने अकड़पने में ही बनी रहती हो।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

चिड़िया की तलाश

मुनि क्षमा सागर जी को
समर्पित

एक चिड़िया
अब खोजती है उसे
जिसके कमरे में
उसने अपने बच्चे बड़े किये थे।
जब वो था,
तब वो सोचती थी
ये आदमी
यहाँ से चला जाये,
और
कहीं और जाकर जिये
ताकि मैं, और मेरा बच्चा
यहाँ सुकून से रह सकें।
अब वो आदमी
कहीं दूर चला गया है,
तो
अब वो
चिड़िया उदास है।
क्योंकि अब
उस पर
कोई गीत नहीं लिखता,
और
न कोई अब उसके लिए
तराने ही गुनगुनाता है।
अब उदासी ही
बस उसके आसपास है,
और अब बस ऐसे ही,
उसका जीवन
बीता जाता है।
वो चाहती है
वो फिर आये,
और उस पर
गीत लिखे..
जिसमें वो हो
उसका बच्चा हो
और आसमान
और एक नदी भी हो।
हों बहुत से पेड़, और घरोंदे
कुछ सीढ़ियां
कुछ कदम, कुछ पत्थर
एक देवता, कुछ पुजारी
और कुछ यति भी हों।
चिड़िया
मुझसे पूंछ नहीं पाती,
और मैं उससे कह नहीं पाता,
कि..
अब ये कमरा कभी नहीं भरेगा।
कि… इसकी धूल भी
अब कभी साफ नही होगी
क्योंकि
इसका देवता,
अब कभी न आने को
कहीं चला गया है।

– निःसंग बन्धु (ब्र. नीलेश भैया)

बिना शांत हुए दूध की परिणति नहीं बदलती*,
आत्मा की कैसे बदल सकती है !
शांति पाने का उपाय – धर्म/वीतरागता।

मुनि श्री महासागर जी

* दूध की परिणति दही बनकर ही बदलती है और दही के लिए दूध को ठंडा/ शांत होना होगा।

जीवन-यात्रा को सुखद वैसी ही बनायें जैसे सड़क-यात्रा को बनाते हैं-
1. भीड़ भरे शहरों से बचने, Bypass का प्रयोग
2. Bump आने पर Speed कम करके
3. ग़लत जाने पर “U” Turn लेलें

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

जल से ही पैदा हिमखंड (तरल से कठोर), मान के कारण जल के ऊपर/सिर पर ही रहता है, बड़े बड़े जहाजों के विध्वंस में कारण बन जाता है।
पूंछ (हमारी पूंछ हो/सब पूंछें) वाली मूंछ तो महिलाओं में भी पायी जाती है।

निर्यापक मुनि श्री वीरसागर जी

दक्षिण में शिक्षा को “दंड” देना कहते हैं यानि जो उदंड को डंडे से अनुशासित करे पर कुम्हार के घड़े बनाने जैसा अंदर हाथ रखकर।
शिष्य संयम रूपी आग से नहीं, राग से डरता है।
शिक्षक तो दर्पण है उसके प्रति अर्पण/समर्पण सब छोटे हैं।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

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