मोटी सी किताब में यदि बीच में एक ही पन्ना हो, पहले तथा बाद के सारे पन्ने फटे हों तो ज़िज्ञासा तो होगी न ! कि उन पर क्या लिखा हुआ था।
वह एक पन्ना वर्तमान का है।
वैसे मरने के बाद प्रियजनों के लिये अधिक से अधिक धन छोड़कर जाना भी चाहते हैं, पर खुद के भूत/ भविष्य के बारे में ज़िज्ञासा/ चिंता/ तैयारी कुछ भी नहीं !!

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

राजा के दरवाजे से एक भिखारी पीठ रगड़ रहा था।
राजा को दया आयी कि इसका कोई साथी भी नहीं है, धन दिया।
अगले दिन दो भिखारी पीठ रगड़ रहे थे, दोनों को कोड़े लगवाये,
दोनों तो एक दूसरे की पीठ खुजा सकते थे।

 (श्री कुरुप)

पर्वतों की चोटियों पर तप करने से भी ज्यादा कर्म कटते हैं, निंदा को सहन करने से।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

धन से नहीं, मन से अमीर बनें,
क्योंकि
मंदिरों में स्वर्ण कलश भले ही लगे हों लेकिन नतमस्तक पत्थर की सीढ़ियों पर ही होना पड़ता है।

(सुरेश)

(महत्व मूल्य का नहीं, उपयोगिता का है >>> सीढ़ियाँ ऊपर उठाती हैं/ भगवान के पास ले जाती हैं)

घर में पेंट करते समय कारीगर ने रंग दिखा कर सहमति चाही।
बुढ़ापे में वैसे तो नज़र भी कमज़ोर हो जाती है;
दूसरा – अच्छे बुज़ुर्गों को सब अच्छा लगता है, बुरों को सब बुरा।

चिंतन

दर्पण को ना*,
दर्पण में देखो ना**,
निर्दोष होने।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

* बाह्य/ Frame/ दर्पण की Quality.
** दर्पण में अपने दोषों को देखो।

Archives

Archives
Recent Comments

April 8, 2022

October 2026
M T W T F S S
 1234
567891011
12131415161718
19202122232425
262728293031