भाग्य, कर्म-भूमि की दुनिया में खाका देता है,
उसमें रंग पुरुषार्थ से भरा जाता है (अच्छा/ बुरा, पूरा/ अधूरा)।

स्वामी विवेकानंद जी

(प्रियजनों का मिलना भाग्य से यानि खाका मिलना।
उनसे अच्छे/ बुरे सम्बन्ध बनाना/ बनाये रखना, पुरुषार्थ से….जया)

एक कलैक्टर ने महाराज जी से साम्प्रदायिक/राजनैतिक समस्याओं के लिये दिशा-निर्देश मांगा।
महाराजा रणजीत सिंह का संस्मरण सुनाया – ताज़िया ऊंचा था, बरगद की शाखा अड़ रही थी। दोनों सम्प्रदायों के लोग आमने-सामने आ गये।
राजा ने गड्ढा खुदवाया, ताज़िया गड्ढे में से निकल गया, शाखा भी नहीं काटनी पड़ी।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

“भा” से ज्ञान जैसे सूर्य प्रकाश/ज्ञान का प्रतीक सो भास्कर।
“रत” रमण करना/आनंद लेना।
भारतीय – जो ज्ञान/ आध्यात्म में रमण/ आनंद लेते हैं।

राधाकृष्ण पिल्लई

आप हर समय आल्हादित कैसे रह लेते हैं ?
मैं क्यों नहीं रह पाता ? ————————- एन.सी.जैन-नोएडा

क्योंकि जो तुम्हारे पास* है, वह मेरे पास नहीं है।
जो तुम्हारे पास नहीं है, वह मेरे पास** है।

चिंतन

* धन/ वैभवादि
** निश्चितता

गुण अवगुण सब में होते हैं।
महत्त्वपूर्ण है कि पहली दृष्टि हमारी गुणों पर पड़ती है या अवगुणों पर। यदि गुणों पर है तो हम गुणग्राही होंगे, अपने गुणों की वृद्धि करेंगे।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

पक्षी ऊंचाइयाँ पाने बारी-बारी से दोनों पंखों को ऊपर नीचे करता है, दोनों को बराबर महत्त्व देता है।
यदि एक पंख को ही ऊपर नीचे करता तो नीचे गिर पड़ता।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

जज दोनों पक्षों को निष्पक्ष सुनता है इसीलिए ऊपर बैठता है,
वकील एक पक्ष की बात करता है सो नीचे खड़ा रहता है।

चिंतन

पिता ने हलुवा बनाकर 2 कटोरियों में से, बेटे से 1 कटोरी उठाने को बोला, 1 कटोरी के हलवे पर 2 बादाम थे, दूसरी कटोरी पर 1 भी नहीं। बेटा 2 बादाम वाली खाने लगा, पिता की कटोरी में नीचे 4 बादाम थे।
दूसरे दिन पिता ने फिर 2 कटोरियों में हलुवा रखा, बेटे ने बिना बादाम वाली उठाई, नीचे बादाम नहीं निकले।
तीसरे दिन फिर 2 कटोरी, बेटे ने पिता से कहा पहले आप उठाओ, बेटे के हलवे में 8 बादाम निकले।
पहले दिन – लालच की सज़ा,
दूसरे दिन – नकल करने की सज़ा,
तीसरे दिन – बड़ों के सम्मान का, लालच पर नियंत्रण का पुरुस्कार।

जीवन में अच्छे से अच्छे तथा बुरे से बुरे लोगों के सम्पर्क में रहना पड़ता है।
उनसे क्या सीख लें ?
रावण जैसे बुरे से लक्ष्मण ने ज्ञान लिया।
राम जैसे अच्छे से….सीताओं के दुःखों में निमित्त न बनें।

उँगलियाँ अलग-अलग Size, मोटाई, strength की क्यों ?
सबसे छोटी उँगली कान की सफाई के लिये पतली, कम लंम्बी ताकि पर्दे को नुकसान न पहुँचे। अगली मोटी आँख साफ करने, बीच की गले के लिये ताकि आखिर तक पहुँचे, चौथी नाक के साइज़ की, अंगूठा ताकत के कामों के लिये।
ऐसे ही परिवार/समाज में Variations होते हुए भी सबकी अपनी-अपनी उपयोगिता होती है।

चिंतन

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं, और क्या ज़ुर्म है पता ही नहीं।
इतने हिस्सों में बंट गया हूँ मैं, मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं।।

कृष्ण बिहारी नूर

ज़िंदगी सज़ा भी है, श्रंगार भी।
ज़ुर्म तो यही था कि जो ज़िंदगी तुमको आत्मोत्थान के लिये मिली थी/हीरा तराशने को मिला था, उसे तुमने टुकड़े-टुकड़े करके औरों को बांट दिया, अपने लिए कुछ बचाया ही नहीं।

चिंतन

पानी दूध से अच्छे से संबंध निभाता है – पानी का मूल्य दूध के बराबर हो जाता है, दूध को जब ज़रूरत से ज्यादा उबाला जाता है, उसके अस्तित्व को बनाये रखने के लिये पानी के छींटे कारगर होते हैं।
पर जब दोनों के बीच थोड़ी सी खटास (नींबू) आ जाती है तब दूध का रूप विकृत हो जाता है।
आपसी संबंधों को भी हम खटास प्रकृति वाले व्यक्तियों से दूर रखें।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

अंकित जैन आगरा के अस्पताल में वेंटीलेटर पर थे। अस्पताल में ऑक्सीजन समाप्त हो रही थी।
अंकित के आग्रह पर मुनि श्री प्रमाणसागर जी का सम्बोधन रिकार्ड करवा के सुनाया गया।
ऑक्सीजन समाप्त होने पर भी अंकित सहज रहे।
उनके लिये ऑक्सीजन सिलेन्डर दिल्ली से भेजा गया पर तब तक अंकित उस स्थिति से बाहर आ चुके थे, उनने सिलेन्डर का भी प्रयोग नहीं किया, अन्य मरीजों को दे दिया।

(अंजू – कोटा)

“पर” के ऊपर की गयी दया से स्वयं की याद आती है (आत्मा की, उसके दया स्वभाव की)।
जैसे चंद्र पर दृष्टि डालने से, नभ पर भी दृष्टि पड़ती है।
(नभ पर दृष्टि डालने से, चंद्र पर भी दृष्टि पड़ती है)

आचार्य श्री विद्यासागर जी (मूकमाटी)

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