उपवन को सुंदर बनाये रखने के लिये सड़े/ सूखे/ असुंदर पत्तों को हटाना होता है।
ऐसे ही जीवन में से सड़ी गली आदतों को हटा दें तो क्या जीवन सुंदर नहीं बन जायेगा !

चिंतन

  • धर्म प्राप्ति के लिये विशेष प्रयत्न, प्रभावना है।
  • भावना अच्छी हो तभी प्रभावना होती है।
  • व्रतों तथा सादगी का प्रभाव प्रभावना पर अवश्य पड़ता है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

  • खम्मामि सव्वजीवाणां, सव्वे जीवा खमन्तु मे।
    मैं पहले सब जीवों को क्षमा करता हूँ और अपेक्षा रखता हूँ कि सब जीव मुझे भी क्षमा करें।
  • जैसे अपने अपराध के लिये दूसरों से क्षमा चाहते हैं,
    क्या दूसरे से अपराध होने पर ऐसी ही क्षमा हम अपने भीतर भी धारण नहीं कर सकते ?

मुनि श्री क्षमासागर जी

  • जब हम आत्मानुराग से भर गये हों, देहासक्ति से ऊपर उठ गये हों, वहीं ब्रह्मचर्य है।
  • परिणामों की अत्यंत निर्मलता का नाम ब्रह्मचर्य है।

मुनि श्री क्षमासागर जी

अब कुछ करना नहीं,
अब तो भावना और उपाय/साधना के फल आने शुरु हो गये, भरेपन का भाव आने लगा है।
सहारे की भावना बुरी है, सहारा देना और लेना बुरा नहीं।
असली परीक्षा तो अभाव में ही होती है।
एक साधू को राजा ने अपने महल में सुलाया, सुबह पूछा-नींद कैसी आयी ?
साधू- कुछ तेरी जैसी, कुछ तेरी से अच्छी (आरामदायक, पर आदत नहीं डाली)

मुनि श्री क्षमासागर जी

न मेरा, न तेरा, जग इक रैन बसेरा।

अवगुणों को छोड़ने का मन बना लें, उन्हें ग्रहण न करें, इसी का नाम त्याग है।

मुनि श्री क्षमासागर जी

  • विषय-भोग जीवन को मुश्किल में डालते हैं।
  • तपस्या मुश्किल में नहीं डालती । तपस्या तो जीवन को आसान बना देती है।
  • जिसके मन में निरन्तर इच्छाएँ उठ रही हैं, उसका मन कभी नहीं भरता, वह तप नहीं कर सकता।

मुनि श्री क्षमासागर जी

अपने मन-वचन और इन्द्रियों को संयमित कर लेना, नियमित कर लेना, नियन्त्रित कर लेना, इसी का नाम संयम है।
यदि हमने अपने जीवन में सत्य-ज्योति हासिल कर ली है तो हमारा दायित्व है, हमारा कर्तव्य है कि हम उस पर संयम की एक चिमनी भी रख दें जिससे वह सच्चाई की ज्योति कभी बुझ नहीं पाये।

मुनि श्री क्षमासागर जी

  • जिसका मन जितना सच्चा होगा उसका जीवन भी उतना ही सच्चा होगा।
  • जीवन उन्हीं का सच बनता है जो कषायों से मुक्त हो जाते हैं।

मुनि श्री क्षमासागर जी

अपन आनन्द लें उस चीज़ का जो अपने को प्राप्त है।
जो अपने पास है वह नहीं दिखता, जो दूसरों के पास है हमें वह दिखता है।

मुनि श्री क्षमासागर जी

जीवन में उलझनें दिखावे और आडम्बर की वजह से हैं।
कृत्रिमता का कारण है…. हम अपने को वैसा दिखाना चाहते हैं जैसे हम हैं नहीं।

मुनि श्री क्षमासागर जी

दूसरों के गुणों में अगर हम आह्लाद महसूस करते हैं तो मानियेगा हमारे भीतर मृदुता-कोमलता आनी शुरू हो गयी है।
तृप्ति मान-सम्मान से भी नहीं मिलती बल्कि मान-सम्मान मिलने के साथ हमारे भीतर जो कृतज्ञता और विनय आती है उससे तृप्ति मिलती है।

मुनि श्री क्षमासागर जी

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जिसने मन कौ मार दयौ,
उसके मार्दव-धर्म आ गयौ।

2) जन्म लेते ही सबसे पहले मान का उदय होता है।

आचार्य श्री विद्या सागर जी
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मार्दव-धर्म की पराकाष्ठा….
80 वर्षीय आचार्य श्री ज्ञान सागर जी ने अपने युवा शिष्य को अपना गुरु बना कर समाधि-मरण की प्रार्थना की।

मुनि श्री विनम्र सागर जी

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