जो जितना सामर्थ्यवान होगा वह उतना क्षमावान भी होगा।
जो जितना क्रोध करेगा वह उतना ही कमजोर होगा।

कागज़ की किश्ती
कुछ देर
लहरों से खेली
फिर डूब गई
इसे शिकायत है कि
किनारों ने इसे धोखा दिया।

मुनि श्री क्षमासागर जी

क्षमा करने से निर्भार हो जाते हैं,
क्षमा मांगने से निर्भय।

मुनि श्री अविचल सागर जी

बरसात आने से पहले बादलों के टुकड़े आ जाते हैं, बिजलियाँ कड़काते हैं, पर पानी नहीं बरसा पाते।
उनमें वेग तो होता है, उपयोगता/सघनता नहीं।
ऐसा वेग किस काम का !

चिंतन

(हिरन की प्रार्थना पर, शेर से उसके बच्चों को बचाने, बंदर एक पेड़ से दूसरे/ तीसरे पर तेजी से छलांग लगाता रहा।
हिरन…पर शेर तो बढ़ता ही जा रहा है ?
बंदर…मेरे efforts में तो कोई कमी नहीं है न !
….सौरभ – नोएडा)

सीखे कहाँ नबाब जू , ऐसी देनी देन;
ज्यों ज्यों कर ऊँचौ कियो, त्यों त्यों नीचे नैन ?
रहीम खान खाना… देनहार कोई और है, देवत है दिन रैन;
लोग भरम मोपै करें, तातै नीचे नैन।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

अपनी
मुश्किलों को,
अपनों के
बीच रख दीजिए !

कुछ
मुश्किलें कम होंगी
और…
कुछ अपने !*

(अरविंद)

* संसार का असली रूप पता लग जायेगा।

आजकल तो अपनों को मुश्किलें बताने पर मुश्किलें और बढ़ जाती हैं …..सुमन

प्रमादी का भाग्य कभी नहीं फलता।
भाग्य भरोसे बैठने वालों को वही वस्तुयें मिलती हैं, जो पुरुषार्थी छोड़ जाते हैं।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

स्वस्थ वह है, जो बिना दवाइयों के जीवन जी रहा हो।
इन्द्रिय-भोग दवायें हैं, इच्छाओं को दबाने की,
पर इनसे इच्छाओं की पूर्ती नहीं होती, इस दवा को लगातार लेते रहना पड़ता है।
तो ऐसा व्यक्ति स्वस्थ कैसे माना जायेगा !!

प्रकाश छाबड़ा

गुरु जी! आप थकते नहीं हैैं ?
गुरु…. थमा हुआ थकता नहीं,
थमे को तो काम करने से ऊर्जा आती है।
भागने वाले को भी थमने पर थकान दूर हो जाती है।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

दुनिया का ज्ञान प्राप्त हो गया पर दुनिया से दूर रहने की कला नहीं आयी, तो बुद्धि किस काम की !
बुद्धि कच्चा माल है, विवेक पक्का माल,
बुद्धि की परिपक्व अवस्था ही विवेक है ।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

घर में गंदगी/धूल दिन-रात आती रहती है, सफाई कई बार।
जीवन में पाप क्रियायें हर समय, उनकी सफाई कम से कम एक बार तो भाव/प्रायश्चितपूर्वक कर लो।
मुनिराज तो बिना पाप क्रियायें किये, 3-3 बार प्रतिक्रमण आदि करते हैं।

चिंतन

विनय को पाने में दान भी सहायक होता है।
कैसे ?
दान से ममकार (मेरा-मेरा) के भाव कम होते हैं तथा पर-उपकार के भाव से हृदय में आर्द्रता/सहृदयता आती है, इनसे विनयशीलता।

नीरज-लंदन

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