ईसबगोल को गर्म पानी से लो तो कब्ज़ दूर, ठंडे से लो तो दस्त बंद।
सादा पानी से लो तो ?
पेट में जाकर प्रश्नचिन्ह ? न कब्ज़ ठीक ना ही दस्त!
इसे कहते हैं अनुभय स्थिति, न सत्य न झूठ/ न पुण्य न पाप।

चिंतन

तपती सड़क पर एक बच्चा नंगे पैर चने बेच रहा था। एक व्यक्ति को दया आयी उसने चप्पल दिलवा दी।
आंसू भरी आंखों से बच्चे ने पूछा – क्या आप भगवान हैं ?
नहीं।
तो भगवान के दोस्त हो ?
ऐसा क्यों पूछ रहे हो ?
कल ही तो मैंने भगवान से चप्पल के लिये प्रार्थना की थी।
व्यक्ति सोचने लगा – भगवान तो बन नहीं सकता, भगवान का दोस्त बनना आसान है, सस्ता भी।

(अरुणा)

ऊब से बचने के उपाय….
1. रुचि पैदा करें
2. स्वीकारें
3. संकल्प पूरा करें
4. लक्ष्य के प्रति आदर भाव रखें

ऊबना है तो पाप से ऊबो, धर्म में डूबो।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

खेलने से ….
1. Team Sprit आती है – Individual Sports के विश्वविजेता के साथ भी पूरी टीम होती है – सेहत आदि के लिये।
2. हारना सीखते हैं।
बार-बार हार कर फिर-फिर खेलते हैं, नये उत्साह/ प्रसन्नता के साथ;
हारना अन्य किसी स्थान पर स्वीकार नहीं है, चाहे घर हो या बाहर।

(डॉ.पी.एन.जैन)

अतीत में जीना मोह है,
वर्तमान में जीना कर्मयोग है,
भविष्य में जीना लोभ है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी

जब मस्तिष्क/शरीर की क्षमता का बड़ा भाग Unutilized पड़ा है, तो धर्म/अध्यात्म के साथ यदि विषय-भोग में भी Involve रहें तो क्या बुराई है ?
अनंत जन्मों से विषय-भोगों में ही तो Involve रहे हैं/उन्हें ही प्राथमिकता दी है/उनके ही संस्कार हैं/उनका आकर्षण बहुत ज्यादा है। इसलिये इस भव में ज्यादा धर्म करते हुये भी यदि थोड़े से भी विषय-भोगों में Involve होगे तो वे धर्म-ध्यान छुड़ा कर अपनी ओर खींच लेंगे।

चिंतन

समुद्र किसी को भी अपना जल ख़ुशी से नहीं देता हालाँकि इसकी वजह से वह खारा भी हो जाता है। खारा भी शायद इसीलिए होता होगा ताकि कोई पी न सके।
पर सूरज उसे तपा-तपा कर पानी छीन लेता है।

चिंतन

पूजा – अष्टद्रव्य (पूजा सामग्री) से भक्त्ति प्रकट करना।
आराधना – पूजा + अतिरिक्त आलम्बन से गुणों का ध्यान।
प्रार्थना – हृदय के उद्गार प्रकट करना….
मन निर्मल करने, कष्ट निवारण, कृतज्ञता प्रकट करने, सामर्थ (कष्ट सहने की) विकसित करने।
याचना – प्रार्थना + स्वार्थसिद्धि।
कामना – स्व-पर हित के लिये।

मुनि श्री प्रमाणसागर जी

बड़ी कंपनी में CEO के चयन के बाद मालिक के साथ डिनर रखा गया।
मालिक ने चयन रद्द कर दिया, क्योंकि उस व्यक्ति ने सूप में नमक बिना चखे डाल लिया था।
छोटा निर्णय ख़ुद नहीं लिया, मालिक को देखकर नमक डाल लिया !
HR Manager – इतनी छोटी सी बात पर निकाल रहे हैं ?
मालिक – इसे छोटी बात मानते हो तो निकालने की अगली बारी तुम्हारी होगी !
(जो छोटी बातों का बड़ा ध्यान रखते हैं, वे ही बड़े बनते हैं)

मध्य-पूर्व में दो समुद्र हैं – डैड सी और गैलिली सी। दोनों में पानी जाॅर्डन नदी से आता है। डैड सी में न तो मछलियाँ हैं, न ही कोई वनस्पति, जबकि गैलिली सी में भाँति-भाँति की वनस्पति व मछलियाँ होती हैं।

इतना फ़र्क क्यों?

गैलिली सी के पानी से गाँवों और शहरों की प्यास बुझती है, खेती होती है। गैलिली सी में कुछ समय विश्राम कर जार्डन नदी भी डैड सी की ओर चल पड़ती है। लगातार पानी का निकास होता रहता है, पर आमद और ख़र्च का संतुलन बना हुआ है।
इसके विपरीत डैड सी किसी को कुछ नहीं देता; फिर भी भीषण गर्मी के कारण उसमें पानी लगातार कम हो रहा है, और इतना खारा हो चुका है कि उसमें जीवन संभव नहीं।

हम क्या बनना चाहते हैं ? डैड सी की तरह ज़िंदा रहते हुए भी मुर्दा, या गैलिली सी की तरह जीवंत और जीवनदायी?

(कमलकांत)

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